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एक सवाल
कल रात एक ख्वाब आया, उसमें एक सवाल आया, की क्या यहीं दुनिया का अंत है ? इंसान बना विनाशी संत है। की क्या यहीं पृथ्वी का अंत है ? एक शर�
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सिर्फ तुम
उर्दू की किताब सी मोहब्बत हो तुम, खुसरो की गजल सी अमानत हो तुम। संस्कृत की किताब सी संसार हो तुम, वाल्मीकि की रामायण सी पुरान ह�
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कृष्ण बन के आया
दिल तेरी सोने सी खारा , रूह तेरी हीरे से शुद्ध , आंखे तेरी नीलम सी सुन्दर , जैसे आसमान में चमकता चांद समंदर। बाते तेरी क्या ही बोलू
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राह पे
एक दिन मिले थे तुम हमसे , कुछ तो कहा था तुमने हमसे । पर क्या करे , हम नादान पंछी , बदल दिए अपनी राहो को तुमसे। कुछ दूर चले ही थे कि याद �
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ये पत्तों की टहनियों से
#पतझड़ ये पत्तों की टहनियों से जुदा होने का मौसम है। तन्हा छोड़ उन्हें हवाओं में बह जाने का मौसम है। ये पतझड़ है। गम की नम आंखों से झांकत
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“घर से हौसला”
मिट्टी का चूल्हा कहता है— बेटा, रोज़ जलना पड़ेगा, तभी घर में उजाला आएगा। रोटी बोलती है— पहले खुद पकना सीख, फिर दुनिया को भूख मिटाने क
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ज्ञान का दीप यदि न जलेगा
जिंदगी में रहेगा अंधेरा ज्ञान का दीप यदि न जलेगा न मिटेगी गरीबी मुसीबत हर कोई जब तलक न पढ़ेगा, जिंदगी में रहेगा अंध�
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एक फूल मिला
एक फूल मिला, जो कुछ मुझसे कुछ दूर मिला। जिसमें लगा कुछ धूल दिखा , जो मुझसे रूठा बैठा मिला। मिला रूठा मुझे एक डगर में, अकेला बैठा सुन सन श
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दुश्मन की शामत आई थी
दुश्मन की शामत आई थी, जो पहलगाम पे वार किया। निहत्थे लोगों का दुश्मन ने नरसंहार किया। बहनों का सिंदूर उजाड़ा, सबका कत्लेआम किया। भो�
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गूढ परी
काठावर साडी झुलते, पावलांशी ताल जुळे, काळी-सावळी कांती तिची, नजरेतच अर्थ खुले. नाकात नथ चमकते, हास्यात गोडसा सूर, काळे केस मोकळे, वाऱ्य
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धुणी
बरसती ठंडी धुंध में आग री ओट, मिनख रो सहारो हुवै। बुढ़िया सिंझ्या खेत सूं आई पाछै, पाळै मांय रोज तपै। बैठक जमती जोरगी चिलम री सट्ट में
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बचपन मुझे याद आता है
बचपन के खेल खिलौने याद आते हैं, बचपन के दोस्त साथी याद आते हैं। बस एक छोटी सी दुनिया थी हमारी, निस्वार्थ बेमतलब थी अपनी यारी। धर्म जा�
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