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धुणी

Radheshyam Joshi 08 Jan 2026 कविताएँ समाजिक 11922 0 Hindi :: हिंदी

बरसती ठंडी धुंध में आग री ओट,
मिनख रो सहारो हुवै।
बुढ़िया सिंझ्या खेत सूं आई पाछै,
पाळै मांय रोज तपै।

बैठक जमती जोरगी चिलम री सट्ट में,
समाचार खेत रा हुंता।
पूणी नौ आळी खबर रेडियो में सुण,
आप-आप रै घरां जाता।

पण राड़ कर'र कदी नीं उठता बै,
राम-रूमी करता ही जातां।
दिण री थकान मेट'र सगळी,
आगलै दिण री हुसयारी लेता।

थक्या-हारा आवंता पण बांरै मन में,
धीरज जबरो हुवंतो।
आज री दुनिया रा लोग मतलबी है,
बां'रौ हेत साचो हुवंतो।

~ राधेश्याम जोशी कोहिणा

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