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Radheshyam Joshi
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@ rathhashayama-jasha
, Rajasthan
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पढ़ाई
भणनो भौत आच्छी बात है, पण गुणनो बीं स्यूं भी आच्छौ। पढ़' रै मिनखपणो नीं आवै, बीं'सूं अणपढ़ गुंवार आच्छौ। - राधेश्याम जोशी कोहिणा
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आसरौ छोड़ सासरै आई
आसरौ छोड़ सासरै आई, बेटी बण नैं रीत निभाई। बाबोसा घर लाड़ लड़ाई, सासरियै में प्रीत निभाई। मैं बेटी हूं जुगा जुगा सूं, पण बेटै सूं लारै
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गौरेया
तपती दुपहरी और तेज धूप, छोटा सा आसियान मेरा भी है। आप के आराम के वक्त, मैं भी आई थी। तपती दुपहरी में सो रहे थे आप, मैं मुंडेर से पुकार कर
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पगड़ी रो भार
पगड़ी को भार, धरती स्यूं भी ज्यादा हुवै। कोई धरती पर रख देवै, कदी रखवाई जावै तो। देखी है जमीन धंसता... - राधेश्याम जोशी कोहिणा
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बूढीया री जूती
चालता जद चरड़ चरड़ करती, जाणै बां'रै हाडा स्यूं होड़ करै। टाबरिया नैं बूंटिया दिरा'र खुद, चापू लगवा लेता बोदी खाल रौ। पण हिम्मत री कमी �
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मां आखर सूं मुंह भर ज्यावै
मां आखर सूं मुंह भर ज्यावै, मां नै देख्यां मन हरसावै। मां रौ करज उतर ना पावै, फरज आपणो बढतो जावै। मां धरणी अर मां ही जरणी, पग-पग माथै दुख
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महात्मा गांधी
बापू नाम नहीं व्यक्तित्व है, एक कालजयी अस्तित्व है। नव भारत के निर्माता वो, 'नव युग' के प्रणेता हैं वो। 'सत्य-अहिंसा' दीप जलाया, अपरिग्�
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अंटार्कटिका का पेंगुइन
अंटार्कटिका का वो अकेला पेंगुइन। जो सोचता भी है, समझता भी है। और फिर मुड़ जाता है एक लंबी, अथाह बर्फ की यात्रा पर__ अपने ही भीतर के पेंग�
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अड़वौ
अड़वौ खेत री फसल रो रुखाळो, अर सुख-दुख रौ भाईलो। फगत डांगर ही नीं घेरै बो, टुटती हिम्मत न पाछी मोड़ै। ईं बात रो अहसास करावै, कै, तूं ऐकल�
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ठाठीयो
म्हारै मां बणावती ठाठीयो, छोटो, बड़ो अर भौत बड़ो। घर रौ सामान संभाळतो, ब्याव-शादी में मिठाई भी। भांत-भांत रा मांडणा अर, हिरमिच सूं रं�
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