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Radheshyam Joshi

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My Articles

भणनो भौत आच्छी बात है, पण गुणनो बीं स्यूं भी आच्छौ। पढ़' रै मिनखपणो नीं आवै, बीं'सूं अणपढ़ गुंवार आच्छौ। - राधेश्याम जोशी कोहिणा read more >>
आसरौ छोड़ सासरै आई, बेटी बण नैं रीत निभाई। बाबोसा घर लाड़ लड़ाई, सासरियै में प्रीत निभाई। मैं बेटी हूं जुगा जुगा सूं, पण बेटै सूं लारै read more >>
तपती दुपहरी और तेज धूप, छोटा सा आसियान मेरा भी है। आप के आराम के वक्त, मैं भी आई थी। तपती दुपहरी में सो रहे थे आप, मैं मुंडेर से पुकार कर read more >>
पगड़ी को भार, धरती स्यूं भी ज्यादा हुवै। कोई धरती पर रख देवै, कदी रखवाई जावै तो। देखी है जमीन धंसता... - राधेश्याम जोशी कोहिणा read more >>
चालता जद चरड़ चरड़ करती, जाणै बां'रै हाडा स्यूं होड़ करै। टाबरिया नैं बूंटिया दिरा'र खुद, चापू लगवा लेता बोदी खाल रौ। पण हिम्मत री कमी � read more >>
मां आखर सूं मुंह भर ज्यावै, मां नै देख्यां मन हरसावै। मां रौ करज उतर ना पावै, फरज आपणो बढतो जावै। मां धरणी अर मां ही जरणी, पग-पग माथै दुख read more >>
बापू नाम नहीं व्यक्तित्व है, एक कालजयी अस्तित्व है। नव भारत के निर्माता वो, 'नव युग' के प्रणेता हैं वो। 'सत्य-अहिंसा' दीप जलाया, अपरिग्� read more >>
अंटार्कटिका का वो अकेला पेंगुइन। जो सोचता भी है, समझता भी है। और फिर मुड़ जाता है एक लंबी, अथाह बर्फ की यात्रा पर__ अपने ही भीतर के पेंग� read more >>
अड़वौ खेत री फसल रो रुखाळो, अर सुख-दुख रौ भाईलो। फगत डांगर ही नीं घेरै बो, टुटती हिम्मत न पाछी मोड़ै। ईं बात रो अहसास करावै, कै, तूं ऐकल� read more >>
म्हारै मां बणावती ठाठीयो, छोटो, बड़ो अर भौत बड़ो। घर रौ सामान संभाळतो, ब्याव-शादी में मिठाई भी। भांत-भांत रा मांडणा अर, हिरमिच सूं रं� read more >>
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