Radheshyam Joshi 26 Jan 2026 कविताएँ समाजिक 5988 0 Hindi :: हिंदी
अड़वौ खेत री फसल रो रुखाळो, अर सुख-दुख रौ भाईलो। फगत डांगर ही नीं घेरै बो, टुटती हिम्मत न पाछी मोड़ै। ईं बात रो अहसास करावै, कै, तूं ऐकलो नीं है भाई, मैं थारै मेहणत रो साक्षी हूं। - राधेश्याम जोशी कोहिणा