PRIYA TIWARI 15 Jan 2026 कविताएँ समाजिक 7679 0 Hindi :: हिंदी
कल रात एक ख्वाब आया, उसमें एक सवाल आया, की क्या यहीं दुनिया का अंत है ? इंसान बना विनाशी संत है। की क्या यहीं पृथ्वी का अंत है ? एक शरीर में दो अंश है। एक कहता है मै हु इंसान, एक कहता है मै हु हैवान। एक कहता मै रौशनी हु, तुम मेरे नीत को अपनाओ, दूजा कहता मै अंधकार हु, मेरे पास चले आओ। कभी खुद के हित के लिए , मनुष्य हैवान बनता और कभी इंसान बनता। खुद में ही जूझता रहता है, खुद से ही लड़ता रहता है, अंदर-ही-अंदर दोनो से, युद्ध करता रहता है। शायद ये ही कलयुगी वंश है, ये ही एक शरीर दो अंश है, ये ही राक्षसी संत है, ये ही ब्रह्मांड का अंत है।..... (लेखिका- प्रिया तिवारी)