Anilkumar Rathwa (Sameer) 12 Jan 2026 कविताएँ समाजिक “घर से हौसला” 8191 0 Hindi :: हिंदी
मिट्टी का चूल्हा कहता है— बेटा, रोज़ जलना पड़ेगा, तभी घर में उजाला आएगा। रोटी बोलती है— पहले खुद पकना सीख, फिर दुनिया को भूख मिटाने का हक़ मिलेगा। झाड़ू रोज़ समझाती है— झुकना कोई शर्म नहीं, जो झुकना सीख गया, वही आगे चलकर घर, समाज और गांव संवारता है। दीवार की घड़ी चेतावनी देती है— वक़्त जंगल के पानी जैसा है, रुकता नहीं, या तो पकड़ लो… या बह जाएगा। दरवाज़े का ताला कहता है— हर किसी को दिल की चाबी मत दे देना, कुछ सपने हिम्मत वाले हाथों से खुलते हैं। लालटेन बोलती है— अंधेरा बड़ा नहीं होता, बस हौसला कम हो जाता है। आईना सवाल करता है— दोष किस्मत को क्यों देते हो? हिम्मत है तो खुद को बदलो। और माँ की रसोई सिखाती है— गरीबी हो सकती है, पर संस्कार अमीर होते हैं। पसीना जब प्यार से गिरे, तो हर दिन त्योहार होता है। युवाओं— शहर की चमक में अपनी मिट्टी मत भूलना, क्योंकि जो मिट्टी से जुड़ा है, वही कल इतिहास से जुड़ता है।