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प्रवीण कुमार
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प्रवीण कुमार
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@ paravanae-kamara
, Haryana
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कोशिशें बतलातीं हैं
कोशिशें बतलातीं हैं सफल विकल्पों की जीवनी। ना-खुश थे जो समझने लगे हैं अब कोशिशें भी निरंतर करनी है। जब-तब हासिल न किए जाएं। सही मकस
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नाक बचाने आए हैं।
नाक बचाने आए हैं। ज़माने में तो नहीं -मेहमान-खाने में। एक सवाल बन जाता है ओर एक जिदद् भी। नाक बचेगी सबसे, पर अपनों से नहीं। राम -राम कह�
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जीवन का सच ही।
जीवन का सच ही। जीवन की मर्यादा बनी। किसी से सुनी भी, तो किसी को कहनी पड़ी। लाख की तस्वीर भी, पहाड़ों की तस्वीर भी। जीवन का सच ही। जीवन �
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कोशिश और हम्हारी तारीफ़
कोशिश और हम्हारी तारीफ़ साथ नहीं मिल सकेंगे। हमें आगे आना है तो कोशिश हमें करनी है। लेकिन खुद से की, न की तारीफ़ हमें कोई मायने नहीं
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आज के प्राणी की जरूरतें भी बड़ी।
आज के प्राणी की जरूरतें भी बड़ी। तमन्नाओं का संसार ही बड़ा, लेकिन सकुन एक पल भी नहीं। लाख से करौडपति ही बना, लेकिन कमजोरी भी वही; कि दौ�
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लाशों की गिनती गुनाहों के साथ नहीं होती।
लाशों की गिनती गुनाहों के साथ नहीं होती। हां, गुनाहा को समझ पाते । वो कि हम -तुम, शायद! हो ही जाता कि सबके सामने वो लाश नहीं होती। नज़रि�
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शायद! ज़िन्दगी की अहमियत
शायद! ज़िन्दगी की अहमियत, कुछ कर गुजरने के फैसले में ही हो। निहायत नेक विश्वासी बनने में ही हो। लेकिन कामनाओं का समुंद्र कहां, सांय भी
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आज बच्चों की नई जिदद्।
आज बच्चों की नई जिदद्। किसी नयी उमंग में जीने की ही तैयारी । लाड़ली -सी उनकी अदाएं जैसी हवा -सी भर दी गुब्बारी। लाड़ भी आता ही है। यूं �
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आज बच्चों की नई जिदद्।
आज बच्चों की नई जिदद्। किसी नयी उमंग में जीने की ही तैयारी । लाड़ली -सी उनकी अदाएं जैसी हवा -सी भर दी गुब्बारी। लाड़ भी आता ही है। यूं �
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एक दिन और जन्म -दिन....
एक दिन ओर जन्म -दिन.... सबकी विकल्प सोच में बदलने का एक खाश दिन। नियम तो नहीं, पर नयापन लाने की कोशिश भी। एक दिन ओर जन्म -दिन.... पर इसके वास�
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