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आज बच्चों की नई जिदद्।

प्रवीण कुमार 14 Oct 2025 कविताएँ समाजिक 10737 0 Hindi :: हिंदी

आज बच्चों की नई जिदद्।
किसी नयी उमंग में 
जीने की ही तैयारी ।
लाड़ली -सी उनकी अदाएं 
जैसी हवा -सी भर दी गुब्बारी।
लाड़ भी आता ही है।
यूं बचपन रोज़ ही नहीं खिलता।
आज बच्चों की नई जिदद्।
जिदद् तो छोटी -सी होती है।
लेकिन सामने उम्मीद रखती
मासूम -सी मुस्कुराहटें कई-2।
राज तो नहीं आती।
पर नये दौर में देखा कि 
बाल-हट का रूप बदला है।
आज बच्चों की नई जिदद्।
इन्सान तो आम ही रहा है।
क्या रहा है और खिला रहा है।
और शायद! सजाई भी रहा है।
अपने ही बचपन की सुखद तस्वीर।
आज बच्चों की नई जिदद्।

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