प्रवीण कुमार 02 Nov 2025 कविताएँ समाजिक 13773 0 Hindi :: हिंदी
नाक बचाने आए हैं। ज़माने में तो नहीं -मेहमान-खाने में। एक सवाल बन जाता है ओर एक जिदद् भी। नाक बचेगी सबसे, पर अपनों से नहीं। राम -राम कहना जो हो जाता ज़माने से खाने की पेशगी अच्छी होती है। पर पुरी तरह से खाना अपनों से ही बेइमानी होती है। ज़माने में तो नहीं -मेहमान-खाने में। सजा-सी लगती है -जिंदगी । घर लौटकर आने में। मिलना हो जाता है । गली में, दोस्तों में और दुकानों में। शायद! वजह इतनी हो खाना घर में मिलना है। अब न कि मेहमान -खाने में। नाक बचाने आए हैं। ज़माने में तो नहीं -मेहमान-खाने में।