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प्रवीण कुमार
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प्रवीण कुमार
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प्रवीण कुमार
@ paravanae-kamara
, Haryana
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एक रिश्ता ही है।
एक रिश्ता ही है। इन्सान की नियत और सच। अकेला भी अपना है, अकेले में भी अपना है। सच निर्दयी भी है। पर इन्सान की नियत का वजूद भी। एक रिश्त�
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एहसास की कथनी बनी, जिंदगी।
एहसास की कथनी बनी, जिंदगी। सच्चा,झूठा कहने को, जिंदगी। मासूमियत भी, दोस्त की मिसाल -सी बनी, जिंदगी। पहाड़ों में तो जिंदा है। इन्सान मे�
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सच अभी कहां सामने आऐ।
सच अभी कहां सामने आऐ। जांच भी तो अधूरी है। बात भी तो अधूरी है। कहानी -सी ही शुरू होती है। लेकिन कहीं पर शुरूआत भी अधूरी है। सच अभी कहां �
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"सच को माना है।"
सच अहम जरुरी है। इन्सान का मन-मनका , होना भी अहम जरुरी है। दोस्तों में दोस्त होना , अपने में सौ होना(आत्मनिर्भर), मेरे दोस्त! अहम जरुरी ह
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तेरे से मेरा कल भी जवां।
तेरे से मेरा कल भी जवां। तेरे से मेरा आज़ भी जवां। उम्मीद तो दिल में हैं। इस उम्मीद से मेरी जिंदगी जवां। लौहे की जंजीरियां कहां? इराद�
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तेरे से मेरा कल भी जवां।
तेरे से मेरा कल भी जवां। तेरे से मेरा आज़ भी जवां। उम्मीद तो दिल में हैं। इस उम्मीद से मेरी जिंदगी जवां। लौहे की जंजीरियां कहां? इराद�
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शुक्रिया करना आसान है
शुक्रिया करना आसान है। लगा जैसे सुनने वाला मेहमान है। यह ठीक ही होता है। बिना वजह शुक्रिया नहीं। करने वाले से नज़र नहीं आती। शुक्रि�
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मज़बूरी
मेहनत न करूं , फिर तो पसीना नहीं आता । बिना पसीने के हवा में बैठ सकूं । आखिर कब- तक यूंही बैठ सकूंगा। मुझे ही नहीं, कोई दूसरे भी होंगे। ज�
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ख़याल-भर ने सवाल किया है।
ख़याल-भर ने सवाल किया है आने वाले कल का। रह-गुजारे की ज़िन्दगी और नये पेड़ की जड़ का। राम सुन्दर पार्क वन है। बेरहम तो हम हैं। ख़्याल-
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कोई ख़ुशी होती है।
कोई ख़ुशी होती है। अपनों के बीच में ही अपने के होने की शुरुआत। अकेले से मन जाती ख़ुशी। हां,मनाई जाती सब के साथ। कोई ख़ुशी होती है। दि�
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