प्रवीण कुमार 10 Oct 2025 कविताएँ समाजिक 11681 0 Hindi :: हिंदी
ख़याल-भर ने सवाल किया है आने वाले कल का। रह-गुजारे की ज़िन्दगी और नये पेड़ की जड़ का। राम सुन्दर पार्क वन है। बेरहम तो हम हैं। ख़्याल-भर ने सवाल किया है। आने वाले कल का। कोशिश की गई है पर हासिल मकसद मुकाम भी नहीं। ज़माना समझे,ना समझे फिर भी। अपनी नज़रों में गिरें, हम वो इन्सान भी नहीं। ख़याल-भर ने सवाल किया है आने वाले कल का। पत्थर तोड़ती ज़िन्दगी से कम नहीं हैं हमारी बातें। सुना तो जाने-अनजाने में । सवाल ही बनीं रहती है। तक़दीर हमारे सामने। वक्त निकल जाता है। अपनों के बीच में दूसरों को समझने में। ख़याल-भर ने सवाल किया है आने वाले कल का।