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आज के प्राणी की जरूरतें भी बड़ी।

प्रवीण कुमार 23 Oct 2025 कविताएँ समाजिक 16697 0 Hindi :: हिंदी

आज के प्राणी की जरूरतें भी बड़ी।
तमन्नाओं का संसार ही बड़ा,
लेकिन सकुन एक पल भी नहीं।
लाख से करौडपति ही बना,
लेकिन कमजोरी भी वही; 
कि दौड़ कहीं जाकर थमी भी नहीं।
आज के प्राणी की जरूरतें भी बड़ी।
अगर आज रुक भी जाए ।
कल फिर भी दौड़ जारी रहेगी।
कोई रुकना भी नहीं चाहेगा ।
क्योंकि उसकी कोशिश ही रहेंगी,
परिवार की नींव हर तरह मजबूत करने की।
आज के प्राणी की जरूरतें भी बड़ी।
इन्सान देखने -समझने का नजरिया,
बदलें भी लेकिन प्रयास तो नहीं।
हां, कमजोरी इतनी ही होगी।
वो सबके साथ -2,
पर, उसके कोई साथ भी नहीं।
आज के प्राणी की जरूरतें भी बड़ी।

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