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शायद! ज़िन्दगी की अहमियत

प्रवीण कुमार 20 Oct 2025 कविताएँ समाजिक 11925 0 Hindi :: हिंदी

शायद! ज़िन्दगी की अहमियत,
कुछ कर गुजरने के फैसले में ही हो।
निहायत नेक विश्वासी बनने में ही हो।
लेकिन कामनाओं का समुंद्र कहां,
सांय भी नज़र आता है।
प्रयास -कोशिशें सब करते रहे हैं।
शायद! इन्सान हारा हुआ ही नज़र में हैं।
शायद! ज़िन्दगी की अहमियत,
कुछ कर गुजरने के फैसले में ही हो।
लाश बनकर उसे जीना तो  नहीं आता।
अपनों के रूठ जाने में ही।
फैसला तो उसके पास ही है ,
फैसला लेने में थोड़ी देर ही सही।
नये विकल्प उसे चुनने ही पड़े,
जिंदगी को नये रंग में; 
बनाने में ही सही।
शायद! ज़िन्दगी की अहमियत,
कुछ कर गुजरने के फैसले में ही हो।
हौसला इसकी पुंजी बनीं है।
और वो खुद के लिए मिसाल भी ही।
आज तो पा चुका है,
मुकाम -ए जिंदगी।
लेकिन अगर कोशिश करता रहा,
तो शायद! आगे कल भी।
शायद! ज़िन्दगी की अहमियत,
कुछ कर गुजरने के फैसले में ही हो।

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