प्रवीण कुमार 01 Nov 2025 कविताएँ समाजिक 9610 0 Hindi :: हिंदी
जीवन का सच ही। जीवन की मर्यादा बनी। किसी से सुनी भी, तो किसी को कहनी पड़ी। लाख की तस्वीर भी, पहाड़ों की तस्वीर भी। जीवन का सच ही। जीवन की मर्यादा बनी। जहां -भर को देखा नहीं। अकेला तो नहीं, साथ भी नहीं। इसके बावजूद... जीवन का सच ही। जीवन की मर्यादा बनी। डर तो सबका है। किसी को कम ही, किसी को निरंतर लगता है। पछतावा भी है, किसी के लिए, निरंतर उम्मीद भी। जीवन का सच ही। जीवन की मर्यादा बनी।