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ग़ज़ल
ibaadaton ki duniya me khoya ho jaise
इबादतों की दुनियाँ मे खोया हो जैसे वो सोया था ऐसे फरिश्ता सोया हो जैसे उसके पत्तों से शबनम ऐसे झड़ती थी रात भर वो दरख़्त अकेले रोया �
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बंजर करके छोड़ेगा
और कितना बवंडर करके छोड़ेगा वक़्त क्या सब खंण्डहर करके छोड़ेगा हाकिम खुश है अपने फैसलों पर लगता है सब बंजर करके छोड़ेगा ये क्या कम �
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आदतों से सुधरा तो सुधरता गया वो
आदतों से सुधरा तो सुधरता गया वो फिर जो उभरा तो उभरता गया वो इतनी सच्ची थी रूह उसकी कि जब जिस्म मे उतरा तो उतरता गया वो दामन से एक धागा �
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कौन हमेशा के लियें कागज की स्याही बनेगा
सच्चाई की कलम,हक की रौशनाई बनेगा है कोई जो दावत देगा,खुदा का दाई बनेगा इबादत करने वाले लोग फिरदौस मे जाऐंगे बेनमाजी मौत के बाद कब्र क�
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खुश्क लबों की प्यास ही रहूंगा
खुश्क लबों की प्यास ही रहूंगा आस हूँ मै और आस ही रहूंगा मुझे कोई दुख नही है यार मगर आदतन मायूस उदास ही रहूंगा जमाना चाहें तेरे लियें �
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आशिकी
कलम मेरी हो गई दिवानी कलम से मेरी आशिकी पुरानी दिले दर्दे गम को पीती हो जैसे जख्मों को शब्दों से सिती है ऐसे दिले मर्ज की दवा है निराल�
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aaino par dag ki sifarish na kar
आईनों पर दाग की सिफारिश ना कर तू बेवजह आग की सिफारिश ना कर मैं तुझे जन्नत बसाकर दे सकता हूँ पर उजड़े हुए बाग की सिफारिश ना कर पहले ही �
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जिस्म थे,नुमाइश थी,दिखावट थी सब ओर
जिस्म थे नुमाइश थी दिखावट थी सब ओर असल चीज गायब थी बनावट थी सब और खानदान ही खानदान के खून का प्यासा था रोजी रोटी के झगड़े थे अदावत थी स�
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इंसानों के खूंखार चेहरों से डरते हैं अब
इंसानों के खूंखार चेहरों से डरते हैं अब जमीन पे फरिश्ते भी कम उतरते हैं अब उखड़ी सड़कों पर कभी निकलकर देखो कुत्ते बिल्ली की तरह लोग म
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rooh kabj kro,hatheli par jan ko utaro
रूह कब्ज करो,हथेली पे जान को उतारो रू ए जमीं पर कभी आसमान को उतारो हम अर्जी देकर थक चुके हैं अब तो कभी नक्शे कागज पर हमारे मकान को उतार�
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निजात
तक़लीफ़ ए ज़िंदगी से, निजात लेने आया हूँ ! नासूर ज़ख्मों पे, मरहम लगाने आया हूँ !! मोहब्बतें तुम्हारी, धड़कने बन गई हैं ! मरहूम ए दिल को, धड़
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Jal- kal
जल, कल | तज, छल | पथ, फल | रण, हल | शक, मल | उठ, चल | सच, बल | लत, खल | धन, पल |
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