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Sudha Chaudhary
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चलें जिस भीड़ में तमाशा था उसी में
नहीं चुभता है,क ईबार बेगाने से, चलो हम डूब गए, किसी बहाने से। संग था,अपनापन था, जिन्दगी आसान थी, घिरे मझधार में ,नही बुलाने से। चलें जिस भ
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समझ सकती हूं मैं
समझ सकती हूं मैं है द्वंद जीवन का सरल हो रहा है हास विस्मय से विरल। कष्ट सृजन में नहीं उन्माद से देखो हो गया है ज्वाल भी अब काल। संवे�
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मैं जो हूं-मैं जो हूं एक तम
मैं जो हूं एक तम, एक संशयात्मा, एक कठिन परिस्थिति, जिस पर रोज रहता है भर का डेरा, एक विराम जो रुक गया है। बरसों से एक उलझन जिस पर नहीं
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किन्तु मुझे प्रिय है
वो क्षण जिसका नहीं कोई अर्थ किन्तु मुझे प्रिय है। ज़मीं हथेली पर जो सर्द रात वीथी वीथी कंप जाती जब कहीं किसी भी तरह किन्तु मुझे प्र
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क्यों तुम्हारी नीर से
क्यों तुम्हारी नीर से आंख का काजल सजाऊं? क्यों तुम्हारी पीर से मैं कोई बादल बनाऊं? तुम विदा हो इसलिए हूं खड़ी इस भीड़ में, स्वप्न सुन्
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जिंदगी खोजती है
जिंदगी खोजती है पैमाने, हर मोड़ पे मिल जाते हैं में खाने। इसे समझो ना शिकायत यह तरीका है पास लाने का आज हूं तो हवाएं भी मुड़ के आयेगी
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अधखिले कपास के फूलों से
तुम आते थे। झिम झिमबरसात की बूंदों से, अधखिले कपास के फूलों से, कलियों की किंचित छाया से, विचलित मन की प्रति छाया से, कहते सुनते अपने ध�
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चलो पथ गामी बने
आज संकुचन को मिटाकर चलो पथ गामी बने। है धरा निस्तेज अलौकिक रूप के स्वामी बने। हदय पर यह बोझ कितना, था ही उसका साथ कितना, मन की इस विचलि�
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अपने अंचल में सहज
मैं नहीं करुणा तुम्हारी आंसुओ का पुंज धोते ये नयन गिर रहे मोती हजारों सघन झड़ रहे ये फूल बता किस बात से दिख रही क्या पता कटुता तुम्हार
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रात बीती मगर दुविधाएं नहीं
घर जिसे समझे थे वो मकान निकला अपने ही दर्द से सब बहा निकला। रिश्ते समझते समझते जिंदगी निकली अब तो कुछ समझने के काबिल भी नहीं। फर्क प�
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