हो कोई भगीरथ, जो गंगा को धरा पर ला सके।
दीन- हीन शोषित नर जिसकी, निर्मल धारा में नहा सके।
भ्रष्टाचार के पेड़ को, जो नष्ट कर दे जड़ सहित।
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क़दर करो उनकी, जिनको उपेक्षित कहते हैं।
बनकर के ख़ामोश जनाज़ा, सब कुछ सहते रहते हैं।
वे सब की जानें, उनकी जाने न कोई।
जो उनकी जान ले, वो � read more >>
त्यागो व्यर्थ की क्रांति।
बोलो ओम् शांति, ओम् शांति, ओम् शांति।
एक सोम है, एक भानु है, एक व्योम साकार।
एक धरा है, एक वात है, एक ही सृष्टि क read more >>
न जीवन- शिकवा, न रोता धोता।
काश, मैं पक्षी होता।
पर फैलाता, अनंत नील गगन में।
परवान चढ़, आसमां नापता खुली पवन में।
लहराता, इठलाता, हवा मे� read more >>