Santosh kumar koli ' अकेला' 30 Mar 2023 कविताएँ समाजिक भागीरथ, भगीरथ 49892 0 Hindi :: हिंदी
हो कोई भगीरथ, जो गंगा को धरा पर ला सके। दीन- हीन शोषित नर जिसकी, निर्मल धारा में नहा सके। भ्रष्टाचार के पेड़ को, जो नष्ट कर दे जड़ सहित। कर्त्तव्यभाव का बिरवा बोए, निष्ठा से करे पोषित। जड़ जाए पाताल, जिसके फल सभी जन खा सकें। दीन -हीन शोषित नर जिसकी, निर्मल धारा में नहा सके। जो रोक सके, साम्प्रदायिकता की फैलती जंग। प्रेमडोर में बांध सके, ज्यों नभ में उड़े पतंग। प्यार, प्रेम, सहयोग की, जो सरिता नई बहा सके। दीन- हीन शोषित नर जिसकी, निर्मल धारा में नहा सके। अन्न- धन का भंडार भरे, बहे विकास की धारा। पेट बांध कोई सो न सके, नहीं रहे बेसहारा। हो कोई बड़भागी, जो नर्धन से निर् हटा सके। दीन- हीन शोषित नर जिसकी, निर्मल धारा में नहा सके। ज्ञान और विज्ञान का, फिर विश्व में हो प्रसार। विश्व- गुरु फिर से बने, यह सपना हो साकार। भारत जैसे देश को, जो शक्तियों की शक्ति बना सके। दीन- हीन शोषित नर जिसकी, निर्मल धारा में नहा सके। यदि भगीरथ नहीं हुआ, तो दुर्गति के दिन दूर नहीं। देश जलेगा जैसे, पीछे छोड़े राख कपूर नहीं। सदियों के तोड़ किनारे, जो सारी बुराई बहा सके। दीन -हीन शोषित नर जिसकी, निर्मल धारा में नहा सके। हो कोई भगीरथ, जो गंगा को धरा पर ला सके। दीन- हीन शोषित नर जिसकी, निर्मल धारा में नहा सके।