जहां आप, अपने रहकर भी हो लुप्त।
आप ही सुस्थ, बाक़ी सब सुस्त।
जिस शिखर पर आप, अपने बहुत पीछे छूट जाएं।
चाहकर भी आपका, नजरों से नाता टूट जा� read more >>
पर्वत से नदी निकलती, लेकर नई उमंग।
कैसे, कौन रोकता है, मिल जाऊं सिंधु के संग।
झर- झर, झर- झर झरने बहते, उसको दे देते आधार।
एक-एक से मिल बन जा read more >>
अगर विजयी बनाना है, तो पहले खुद को ही जीत।
खुद को ही नहीं जीत सका, औरों की कैसे लिया चीत?
पहला शत्रु काम है, जिससे लड़ना नहीं आसान।'
देव- त� read more >>