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Santosh kumar koli ' अकेला'

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My Articles

जहां आप, अपने रहकर भी हो लुप्त। आप ही सुस्थ, बाक़ी सब सुस्त। जिस शिखर पर आप, अपने बहुत पीछे छूट जाएं। चाहकर भी आपका, नजरों से नाता टूट जा� read more >>
घर में पिताजी हैं, तो नौकर के पैसे बचते हैं। सब्ज़ी खरीदने, बच्चों को स्कूल लाने, ले जाने में जचते हैं। पिताजी घर में, नौकर नहीं, तो क्या read more >>
पर्वत से नदी निकलती, लेकर नई उमंग। कैसे, कौन रोकता है, मिल जाऊं सिंधु के संग। झर- झर, झर- झर झरने बहते, उसको दे देते आधार। एक-एक से मिल बन जा read more >>
अगर विजयी बनाना है, तो पहले खुद को ही जीत। खुद को ही नहीं जीत सका, औरों की कैसे लिया चीत? पहला शत्रु काम है, जिससे लड़ना नहीं आसान।' देव- त� read more >>
हम, स्कूली शहज़ादे। काज चबी पैवंदी कमीज़, कुछ हंसकर कुछ रोकर। तह कर सिरहाने रखते, नदी खार में धोकर। चुग़ली करते अंगूठे, जूतों से बाहर झ read more >>
मैंने, समय को करवट बदलते देखा। औलाद से हारते देखा, दुनिया जीतने वाले को। जटाओं पर जीते देखा, भारी- भरकम तने वाले को। रिश्ते रास्ते बदल � read more >>
यह ज़िंदगी, एक क्रिकेट है। आदमी एक खिलाड़ी है। कितना ही अच्छा खेलो, हारता जो क़िस्मत आड़ी है। जीवन पिच् पर चलती, जाती समय की गाड़ी है। read more >>
यौवन युक्त विभावरी, श्रृंगार करे रजनी रानी। जूड़ा खोले, केश सुखाए, छिड़क गया अमृतपानी। अल्हड़ बूंद नादान- सी, धरती पहुंच इतराती। चमचम read more >>
जाज्वल्यमान मणि, चमचम चमक रही है। दृष्टिवंत क़िस्म, मणिमय दमक रही है। तीक्ष्ण रश्मि अंतरायण, वहीं सिमट रही है। रश्मि से रश्मि, बेमन ल� read more >>
चांद तू क्या था, क्या हो गया? भारी- भरकम पेड़, बुढ़िया सरसर सूत कातती। बैठी बूढ़ी आंखों से, जवां जहां को ताकती। बच्चों को बहलाती मां, चा� read more >>
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