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DIGVIJAY NATH DUBEY
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DIGVIJAY NATH DUBEY
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छोटी सी कोठरी में
छोटी सी कोठरी में चार पांच होंगे जो जी रहे हैं तपस्या भरी जिंदगी जो पूर्ण कर रहे उस कर्ज को जो बिना लिए भरना है तपती धूप के बाद जब शा
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देहाड़ी मजदूर
खाना बंद लिए उन हाथों में दिन के उजाले जग चुके हैं एक भीड़ है जो तरस रही है एक काम की तलाश में वो काम को पाल सकता है उन नन्हे नन्हे कोप�
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कौन सुनता है
तेरे बगैर दिल की बातें कौन सुनता है क्या तकलीफ है क्या पीड़ा है इस तकदीर का क्या किस्सा है रात रात भर जग के हरदम आंख के आंसू कौन पोछ�
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लक्ष्मी बाई
धधक उठी जब ज्वाला नभ में धूल भरा अंधियारा उपजा जब लक्ष्मी बाई का अस्त्र दुश्मन की सेना को गरजा शिव का डमरू दमक गया सहम उठा इंद्रासन
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तुम्हें छू के देख लूं
क्यू इंतजार रहता है आज कल नींद में आगोश हो जाने की जहां मुलाकात होती है तेरे चंचल नैनों से एक हवा के झोखों की तरह आकर यूं चले जाना ते�
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कितना अच्छा होता
काश हम तुम एक सफर में होते वो सफर जो खत्म ना हो सफर के रास्ते में वो प्यारी वादियां हो जो समेटने को तैयार हों अपने बाहों के आनंद में �
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तुम मेरे पास ही आओगे
भीड़ में एक चेहरा खोजते रहना मेरी बातों को याद कर रोते रहना जो हर पल तुझे चाहत की सौगात दे ऐसे तबस्सुम को पूजते रहना बिछड़ के मुझसे ए�
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मिट्टी का इंसान है
मिट्टी से बनकर ही जन्मा, मिट्टी का इंसान है | किस बात की ईर्ष्या. है| और किस बात की माया है| किस बात का लोभ है पगले, किस बात की काया है | जो �
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जिस दिन उतारूंगा मैदान में
जिस दिन उतारूंगा मैदान में , विजय पतला लहरा दूंगा मत छेड़ो मेरे जस्बा को , तुम पर भारी पड़ जायेगा छोड़ छाड़ के दौड़ भाग के खेल के रण स�
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