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DIGVIJAY NATH DUBEY
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DIGVIJAY NATH DUBEY
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भारत का परचम छा रहा
सर पे थी पगड़ी केसरी हाथों में खंजर तेज सा दिल में सजा कर वीर रस चलने लगा दल वीर का अंग्रेज की औलाद सुन तेरा समय अब जा रहा हर दिल में ह�
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कल वो भूखा ही सो गया
कल वो भूखा ही सो गया मजदूरी का सहारा लिए जो कल तक दे रहा था सहारा उस परिवार को जो इंतजार करता था दिन भर आएगा शाम कभी मिल जाएगी इस क्षु
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सूरवीर-बस वीर नहीं शूरवीर हो तुम
शूरवीर बस वीर नहीं शूरवीर हो तुम इस जनता कि तकदीर हो तुम । तेरी रक्षा के साए में फूले फनगे और बड़े हुए । तेरे त्यागी व्यवहारों से �
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यह संसार हमारा होगा
तू जो दे दे साथ मेरा तो यह संसार हमारा होगा पड़ जाता हु मै अकेला जग की कोई बात करू सोच सोच के मन अकीचिंतन किस किस से सुरुआत करू कोई मि
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प्रेम की भाषा हिंदी ही है
भीड़ पड़ी है जग में अतिचर भाषाओं की झुंड पड़ी है हमको बस जो सूझ रही है प्रेम की भाषा हिंदी ही है जो जोड़ती गंगा यमुना कश्मीर या कन्य�
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महा बलिदान गाथा मैं लिखूंगा
मैं लिखूंगा दास्तान ए शौर्य की विजय गाथा मैं लिखूंगा प्रगति के पथ की तपस्या का खुलासा मैं लिखूंगा सर जमीनें हिंद के रण की गरजते तो�
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मैं क्या तुझे डर जाऊंगा
तू क्या समझा ऐ व्यभिचारी मैं क्या तुझे डर जाऊंगा शांत हृदय सा था मैं बैठा तूने ही हुंकार लगाया क्रोध की चिंगारी बिखराकर तूने दिल मे�
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झुग्गी-झुग्गी झोपड़ के तरकश में
कहीं सड़क पर कहीं वीराने अलिशान भवन बनवाया जिसको पत्तल से ढककर के कपड़े का दरवाजा लगवाया एक नही सौ दो सौ होंगे ऊंचे बंगले वाले जन छ�
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एक काम की तलाश में
खाना बंद लिए उन हाथों में दिन के उजाले जग चुके हैं एक भीड़ है जो तरस रही है एक काम की तलाश में वो काम को पाल सकता है उन नन्हे नन्हे कोप�
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बुढ़ापे से मृत्यु की ओर
एक सफेद धोती को लपेटे हुए जिसकी सफेदी क्षीण हो चुकी थी ऊपर का तन नंगा ही छोड़ दिया एक दंड को हाथ में थामे हुए चल रहा था डगमगाते हुए उस
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