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देहाड़ी मजदूर

DIGVIJAY NATH DUBEY 17 Apr 2023 कविताएँ समाजिक #Majdoor 30508 0 Hindi :: हिंदी

खाना बंद लिए उन हाथों में 
दिन के उजाले जग चुके हैं 
एक भीड़ है जो तरस रही है 
एक काम की तलाश में 
वो काम को पाल सकता है
उन नन्हे नन्हे कोपलों को
जो भूख से बिलबिला रहे 
ये भूख है जो शांत नहीं होती
जिसकी इच्छाएं इतनी प्रबल 
सब इच्छाएं भूल जाती 
जब भूख है आती
नजरें तलाश रही टकटकी लगाए 
कोई आए कुछ काम दिलाए
भीड़ इतनी है इन खाना बंद लोगो की
टूट पड़ रहे उन अज्ञान लोगो पर 
जो काम देने के कारण आ खड़ा हुआ है
काम है तो बस दो का 
बाकी का तो सैलाब उमड़ा पड़ा है 
इक्के दुक्के लोग ही निकल जा रहे हैं 
शायद वो किश्मत वाले होंगे 
जो शाम की रोटी खाने वाले होंगे
दोपहर हो चली है इंतजार के पल में 
अपनी बारी नही आई
अपने जैसे दो चार और भी हैं
जिनकी भी किस्मत नही भाई
अब और इंतजार करने की हिम्मत नही है 
हो चुका जो होना था
जा चुका जिनको जाना था 
आज मेरे हाथ में रोटी की किस्मत ना लिखी थी
है काम कोई ना जिनकी मरम्मत ना बनी थी 
हाथ में उठा के खाना बंद धुधले आंख से 
जो अश्रु के धार से टपकने को लालयित थी
एक आश लिए गया था 
बे आश लेकर आ गया 
बस छोड़ आया समय 
जो बिता दिया इंतजार में
जिनकी कोई कीमत नहीं
जिनकी कोई कीमत नहीं।

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