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Bholenath sharma
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गाँव भूले नहीं है
भले ही बस गये है रोटी के लिए शहर, गांव क्या है ये हम भूले नहीं है। बंद कोठरी में हम बेमन रहते यहाँ , घर का खुला आँगन हम भूले नहीं है।
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हार क्या है ये पता ही नहीं
असफल तो रहे मगर , कोई नहीं इस बार कोशिश और अच्छी करेंगे हम हार क्या है ये पता ही नहीं सीखता हूँ वो जो कही सिखाया ही नहीं हमे�
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जप लो राम राम
अभिनंदन , अभिनंदन , अभिनंदन पधारो मेरे प्रभु कौशल्या नंदन मगन है अवध की हर गलियाँ मेरे प्रभु आपक
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मेरे प्रभु राम आये है अपने धाम हो रहा है मंगल गान
हो रहा है मंगल गान मेरे प्रभु आये है अपने धाम मगन है सब प्रभु के धुन में मेरे प्रभु आये है अपने धाम
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हे सम्बन्ध पुराना तुमसे-दे गये हमे अनेक धरोहर
दे गये हमे अनेक धरोहर प्रकृति का ये दृश मनोहर उसके रक्षक सारे जन , है सबकी यह दित्य धरोहर ये बह�
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स्वार्थ-मैं उन्हें जानता हूँ पर वो मुझे पहचानते नही
मैं उन्हें जानता हूँ पर वो मुझे पहचानते नही , बिना काम के वो मुझको
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जीवन है कि आना जाना- जन्म हुआ फिर हे बचपन आना
जीवन है कि आना जाना जन्म हुआ फिर हे बचपन आना बचपन आया फिर यौवन आना यौवन आया फिर बुढ़ापा आ�
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उड़ रही है पतंगे-आज रंग विरंगे पतंगे
आज इस सक्रान्ति के अवसर पर उड़ाते है हर लोग पंतगे आज ये नीला गगन भी हो गया है। रंग विरंगे । उड़ रहै नीले ग�
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प्यारी मधुशाला-क्या गीत लिखूँ में तुम पर जो प्यार लुटाये हर प्याले ने
क्या गीत लिखूँ में तुम पर जो प्यार लुटाये हर प्याले ने बिना ही पथ बतलाये आते है। रोज तेरे प्याले , तू �
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लोगों के काम आता रहूँ- लोगों की प्रशंसा सुन के मुस्कुराता हूँ
मैं शांत हूँ तो अच्छा है , और अन्याय सहूँ तो और अच्छा हूँ । कोई उटपुटाँग बोले
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