अशोक दीप 17 Jun 2024 गीत समाजिक ग्राम गीत, गांव, villege poetry, villege song 48845 0 Hindi :: हिंदी
गाँव
संदली रज-कंध पर फिर
शीश धरना चाहता हूँ ।
खोलकर बाँहें युगल मैं
गाँव भरना चाहता हूँ ।
एक अरसा हो गया है
आँखभर देखे चमन को
चाँद तारों को उठाए
गोद में नीले गगन को
शैल सा भारी मनस है
पुष्प करना चाहता हूँ ।
खोलकर बाँहें युगल मैं
गाँव भरना चाहता हूँ ।
मौन पत्थर की तरह मैं
जी रहा हूँ कैद होकर
ढो रहा हूँ मेघ अगणित
नैन में अवसाद बोकर
मौत जैसी सीढ़ियों से
अब उतरना चाहता हूँ ।
खोलकर बाँहें युगल मैं
गाँव भरना चाहता हूँ ।
पा लिया हूँ क्या भला मैं
कैक्टसों के द्वार आकर
खो दिया अमराइयों को
बोनसाई वट सजाकर
डाल से निष्ठुर नगर की
आह झरना चाहता हूँ ।
खोलकर बाँहें युगल मैं
गाँव भरना चाहता हूँ ।
०००
अशोक दीप
जयपुर