Irfan haaris 07 Apr 2023 ग़ज़ल समाजिक गुरबत के इस मकान से आगे न बढ़ सके 36380 0 Hindi :: हिंदी
हम सच वफ़ा ईमान से आगे न बढ़ सके गुरबत के इस मकान से आगे न बढ़ सके सरमायादार बन गए वो ईमान बेचकर हम छोटी सी इस दुकान से आगे न बढ़ सके दुनिया का दावा है कि हम समझें हैं खुदा को हम तो कभी इन्सान से आगे न बढ़ सके आया न यकीं लोगों को कभी मेरे हुनर पर वो इक शराबी इरफ़ान से आगे न बढ़ सके