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Irfan haaris
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ख़ुदा खामोश बैठा है
ख़ुदा खामोश बैठा है अकेला बन्द कमरे में बड़ा गुमसुम सा रहता है अकेला बन्द कमरे में आके दुनिया में शायद बहुत करीब से देखे इन्सां बनाए
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हम सच वफ़ा ईमान से
हम सच वफ़ा ईमान से आगे न बढ़ सके गुरबत के इस मकान से आगे न बढ़ सके सरमायादार बन गए वो ईमान बेचकर हम छोटी सी इस दुकान से आगे न बढ़ सके दु�
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हमारे सभ्यता
जड़ें कट चुकीं हैं हमारी संस्कृति की हमारी सभ्यता की तीव्र गति से बदलते संसार में मानवता की सूख चुकीं हैं शाखाएं सगे सम्बंधी और मित�
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तुम आना इक दिन
तुम आना इक दिन मेरी सूनी दुनिया में मेरी खाली बाहों में मेरे बालों को सहलाना मेरे सीने से लग जाना फिर आके तुम न जाना मैं वक्त से बदला �
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ग़लती
ग़लती करने के लिए हमें तैयार किया जाता है बचपन से हमारे अपनों के द्वारा जब हम छोटी छोटी ग़लती करते हैं तो हमें हमारे मां बाप वृद्ध कर
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मैं भारत हूं
मैं भारत हूं स्वतन्त्र भारत परन्तु मेरी स्वतन्त्रता की एक पराधि एक सीमा तय कर दी गई है अतिथि देवो भवः सदियों से मेरी परम्परा रही है �
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जीवन रिक्तियां
जीवन के पृष्ठों पर उपस्थित हैं विभिन्न प्रकार की रिक्तियां अनेक शैली में जो गाहे ब गाहे याद आती हैं याद आती हैं उस समय जब छोटी सी वस�
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चैन
चैन जिसको मिला होगा हां वही दर्द से घबराएगा ख़ुशी जिसको मिली होगी बस वही ग़म से घबराएगा जो जितना ज्यादा हंसा होगा वो उतने ही आंसू बहा
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शब्द और ईमान
दायरों और मायनों को साथ रखते हैं शब्द और ईमान दोनों साथ बिकते हैं कभी ईमान शब्दों को बेच देता है कभी शब्द ईमान को बेच देते हैं लेकिन ह�
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कितना सहज है झूठ
कितना सहज है झूठ कितनी आसानी से बोल जाता हूं झूठ भूल जाता हूं के यही झूठ हमें संकट में डाल के हो जाता है दूर रह जाती हैं अनगिनत सच्चाई
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