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Rupesh Singh Lostom
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Rupesh Singh Lostom
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, Uttar Pradesh
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सोच
सोच बचपना जीने नहीं देता जवानी रूकने नहीं देता ठोकर संभलने का मौका नहीं देता ग़म अपनाया नहीं जाता खुशी ठुकराई नहीं जाती बिना जरूरत
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विचार
विचार रेत से दीवार बनता नही खंडहर कभी संवरता नही टूट जाते है सभी रिस्ते जो यह एक बनता नही खुश्बू हमेशा रहती नही काँटे कभी महकते नह�
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कल्पना
कल्पना कल्पना निशब्द है वे अर्थ हे वेकार शब्द हीन और वेबश हैं बेनाम और बेकदर गुमनाम है नाजूक कमजोर और विशाल है कौन कहता है इसकी श�
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चलन
चलन साल बदला सदी बदला बदल गऎ हम और आप नही बदला चाँद सुरज खुश्बु रंग आश्मान धर्म बदला मजहब बदला बदल गया संसार नही बदला सुर्य के किरणे
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जीवन मुल्य
जीवनमुल्य प्रेम करो सब से करो प्रेम है पुजा प्रेम है पावन प्रेम है बस प्रेम है तू नसवर तन चंचल मन पञ्च तत्ब से बना हुआ पृथ्वी अगनी जल
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कौन है अपना
कौन है अपना कौन है अपना कौन पराया ,ये नही मैं जान पाया भाई बंधू दोस्त महिप ,माँ बहन या बुआ मौसी हम यह न जान पाये ,कौन है अपना कौन पराया स
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मौसम
मौसम मौसम में सरगोशी देखो इसकी ये मदहोशी देखो कभी इतराए कभी लुभाए इसकी ये चापलूसी देखो कभी बदन को कभी नयन को कभी बालो को छेड़ के जाये �
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ख्वाबो में आती है
ख्वाबो में आती है ख्वाबो में आती है ख्वाबो में सोती है ख्वाबो में जगती है ख़्वाब की तरह ख़्वाब सजाती है ख़्वाब की तरह ख्वाब ख़्वाब में ही
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तू है तो
तू है तो तू है तो दुनिया की हर चीज हमारा तू है तो संसार के हर रीत हमारा तू है तो ये धरती ये आशमान हमारा तू है तो ये नदिया इस में बहता नीर �
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अगर हमारे पास तुम होते
अगर हमारे पास तुम होते अगर हमारे पास तुम होते कभी रूठता कभी मनाता कभी सुनाता तुम्हे कविता लिखता तुम पर गजल नज्म गीत सुनाता गुल बुलब�
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