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Rupesh Singh Lostom
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Rupesh Singh Lostom
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, Uttar Pradesh
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पिली साड़ी बाली
पिली साड़ी बाली नखरे खूब दिखाती हैं सारि सारि रात जगाती हैं अपने हुस्न के जादू से मुझपे रौब खूब जमाती हैं पिली साड़ी बाली थोड़ी नखरेल
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जिद हैं जिद से की जिद न हारने देंगे
जिद हैं जिद से की जिद न हारने देंगे समय के रफ़्तार से खुद को न हारने देंगे वक़्त ने बहुत जख्म वे वक़्त दिए हैं इस बार उसको भी न जुल्म करने �
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व्यापारी किसान हैं
रोटियां खिलाने वाले खुद भूखे सो रहे अन्न उगाने वाले को हैं दीमक खा रहे जो किसान हैं वो अब किसान लगते नहीं वड़े वड़े व्यापारी किसान ब
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भरम वाला निशाचर
भरम वाला निशाचर डराने लगा है सपने में भी भयभीत करने लगा हैं रोज़ रोज़ नए नए तरह तरह के वादे खौफ ज्यादा दिखाने लगा हैं कुर्सी की नीत�
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वाकी है
बहुत वाकी है पाने को एक अलग जाहा वनाने को अभी तो शुरुआत है सफर की मंजिल के आखरी पड़ाव वाकी है वाकी हैं अभी आशमा झुकाने को कुछ समस्या
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ॐ नमो शिवाये ३...
शम्भू शंकर कैलाश निवासी उमा पति काशी विश्वनाथ . हे गीरधर गोपाल मंगल करता विधन हरता त्रिनेत्र त्रिकाल ॐ नमो शिवाये ३... दया करो ये अय�
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तकदीर
पराए तो पराए थे कुछ अपने थे सो रुठ गये कुछ सपने थे सो टूट गये चुन चुन तिनका घर बनाया कुछ अँधियों से उजड़ गये और कुछ वारिस मे बह गये व
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ग़ुम
अविश्वास ही अविश्वास हैं इस दोहरी समाज में इंसान ही इंसान को हर जगह गिरा रहा ग़ुम गई इन्सानियत इंसान के करतूत से संदेह में प्रारब्�
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स्नेह
मुझे मोहब्बत सी हो गई तेरी आदत सी हो गई मोहब्बत होती ही हैं प्रतिकूल फिर भी अनुभूतियुक्त हैं तेरी याद सताने लगी है सारि रात जगाने
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मन
तू मो को काहे ढूंढे सइयां मैं तो तेरी बन बैठी हूँ शहर शहर और गांव गांव मो को काहा खोज रहा मैं तो तुझ में ही अंदर हूँ क्यों नगर नगर में �
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