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Rupesh Singh Lostom
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Rupesh Singh Lostom
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, Uttar Pradesh
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आना सिर्फ मेरे लिए
तू जब भी आना सिर्फ मेरे लिए आना जो चहु कर सकू जैसे चहु रह सकू कुछ सुनु कुछ सुना सकू तू रूठे तो मना सकू तू आना जरूर पर मेरे लिए तुझे कु
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अभागा
प्रेम; मुहब्बत; आशिकी; चाहत; अनुराग, इश्क़, हुस्न,जवानी या फिर उफनती क्यारी क्या कहु प्यार की मूर्त अनुराग स्नेह, भक्ति, लगाव या फिर मे
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ढलते देखा है
इस रंग बदलती दुनिया को कई रंग बदलते देखा है कही तस्वीर तो तस्वीरों में ढलते देखा है कभी मंदिर तो कभी मस्जिद तो कभी टुटते तारो के आ
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ए ही प्यार है
ए ही प्यार है चलते –चलते जब कदम रोक जाये बैठे-बैठे उदासी तेरे चेहरे पर झलक जाये आँख नम होने लगे सांस थमने लग जाये धड़कन तेज़ हो जाये �
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उम्मीद
उम्मीद के बादवां ने जिन्दा रखा है तुम्हे पास होने का जिकर किया है दिल का दर्द लहू बनके बिखरा है तुम्हारी आँखों के नशे में अपने आप को �
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मुझे चाहिये तू
मुझे चाहिये तू और तेरा साथ रात की जागती आँखे और उलझे सवाल बिखरते सपने सिमटते ख्वाब और डुबे भाव और टुटते ऎहसास मुझे चाहिये तू और �
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संगनी
दिशाओं को बताती जख्म को सहलाती हवाओ में फैलने वाली फिज़ाओं को सजाती प्रकृति से सुशोभित ओश की शबनमी बूँद मेरी सोच में तैरने वाली सं
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तस्कार
काश जालिम ने एक तस्वीर दे दिया होता कविता लिखते – लिखते उस की तस्वीर बना लेता काश कुछ देर ठहर जाते वो मेरे निवास में शायद उनको देख
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रिस्ते
रिवाज़ बदलते गए रिस्ते टुटते गए जो अपने हमारे थे वो सब बिछड़ते गए हमने जब भी कोशीश कि उन लम्हों को समेटने की तब तक रिस्ते बदल गए न गवा
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इश्क़
इश्क़ भी क्या अजीब होती है होती है जिस को भी संगीन होती है खुद तो तड़पती है ताह उम्र जिसको तड़पाती है उस को ताहे जमीन करती है इश्क़ वफा क
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