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Rupesh Singh Lostom
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Rupesh Singh Lostom
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, Uttar Pradesh
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उलूल जुलूल
खुजली वाले भैया खूब खुजली फैला रहे पानी फ्री बिजली फ्री घूम घूम के खूब बाट रहे पंजा बाली अम्मा दीदी और शहजादे अमेठी से वायनाड तक प�
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बस रहे मेरे
था मैं एक चित्र अधूरा मेरा तस्कार तू कोरा था ये जीवन मेरा इस पे लिखा किताब तू प्रेम की देवी प्यार की मूर्त प्रेम के जीवित मात्र प्र�
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मूलतत्व
काल रूपी सयम से बक्त भी लाचार है समय के इस चक्र से हर कोई अंजान है जिस दिन बदल गया माहाकाल के स्थिरता चारो ओर विनाश होगा बस बचेंगा
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बंचित
प्रेम; मुहब्बत; आशिकी; चाहत; अनुराग, इश्क़, हुस्न,जवानी या फिर उफनती क्यारी क्या कहु प्यार की मूर्त अनुराग स्नेह, भक्ति, लगाव या फिर म�
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रंग बदलती
इस रंग बदलती दुनिया को कई रंग बदलते देखा है कही तस्वीर तो तस्वीरों में ढलते देखा है कभी मंदिर तो कभी मस्जिद तो कभी टुटते तारो के आ�
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अभिलाषा
अभिलाषा थी एक दिन तुझे पा सकू पर एशा हो न सका कुछ लम्होने भी संजोये थे यादें कुछ इकठा हमने भी किए थे सासें समय के तराजू प्यार के मोल थ
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क्या जानते हो
तुम्हे खुद पर दस्तर्श है तो ये बताओ तुम अपने के बारे मे क्या जानते हो इश्क प्यार मोहब्बत हुस्न जवानी बडा करते हो तो ये बताओ उसकी आ
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घर ही पे
बहुत अच्छे वक्त गुजारे है ज़िन्दगी के ज़रा रुक जाई ठहर जाई ऐ घर ही पे ये भी दुख के बादल छट जायेंगे सभी के फिर निकलेंगे धुम से शहर घुमन
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टनकार
काल है डरा रहा मौत के टनकार से चल सको तो चलो अंधकार मे है जग सारा चल सको तो चलो आशमा वरसा रहा अंगार के बौछार है चल सको तो चलो काल है ड
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माँ
माँ ईश्वर के सूरत सायद माँ से मिलती है तभी तो बो भी आता है बार बार बारमबार धरती पे माँ को ढूढते ढूढते कभी देवकी पुत्रा कृष्ण तो कभी �
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