Santosh kumar koli ' अकेला' 02 Jan 2025 कविताएँ समाजिक ज़मीन और किसान 17586 0 Hindi :: हिंदी
पैसों की चमक, हलधर रश्मि को मना नहीं सकती। बैसाखी अपने बल पर, विजय जामा पहना नहीं सकती। कमकस को ज़मीन, कृषक अपना नहीं सकती। मिल्कियत मालिक बनाती, किसान बना नहीं सकती। मेहनत भी, जिसके आगे थकी है। क़िस्मत की चाबी जिसने, नियति को सौंप रखी है। जिसके पसीने की महक को, मिट्टी- महक चखी है। जिसके अभावों की छाॅंव से, यह फली फ़सल पकी है। बीज को जिसकी, जिसको बीज की पहिचान है। हल चर्राते, बेैल गर्जते जिस मकान है। चेरिंदे- परिंदे हमजोली, घर टपरा, मचान है। मूठ, जुआ से भाग्य लिखता, वही सच्चा किसान है। वही सच्चा किसान है।