प्रवीण कुमार 09 Oct 2025 कविताएँ समाजिक 4999 0 Hindi :: हिंदी
उम्मीद से कहता हूं आपको ज़िन्दगी खुदा है। सजाई समझ रहा हूं बस आपको। कर्म -कर्तवय अब भी अपने हैं। झूठे जो बस वो ख़्वाब है। कल से अकेला रहा अब जिंदगी का सबक साथ है। आशा है पर नेक विश्वास भी। मेरी तो दौलत ही सच्ची है। यही तो मेरी दौलत है। आग जैसे से सामना, मेरे वजूद ने किया। हां रोकने के लम्हें , मेरे करीब रहते हैं। मैं साथ सबके हू- इस सच से ही जी रहा। कायल किया मेरे गुमराह इरादों ने आज खुश हूं - अकेला भी सच के साथ रहा।