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नेकी का दर्द

Santosh kumar koli ' अकेला' 19 Jan 2025 कविताएँ समाजिक नेकी का दर्द 20919 0 Hindi :: हिंदी

तिनके के अवलंबन से, 
तैर जाता डूबता। 
तैरकर तृण को ही डुबाए, 
यह कैसा का़यदा? 
बाड़ की आड़ में, 
उग आती दूब यदा- कदा। 
उग बाड़ को ही बाढ़ दे, 
यह कैसा वायदा? 

गेहूं के साथ-साथ, 
पानी पी लेता बथुआ। 
क्या हो जब बथुआ ही, 
गेहूं को दे दे बददुआ? 
झुरमुट की आड़ में, 
नन्हा नीम बड़ा हुआ। 
देख खड़ा नीम को, 
झुरमुट को ही दे कटवा। 

जिसके नाम जपने से, 
मिट जाते सकल संकट। 
संकटमोचन को ही भूले, 
बन जाते मतिमंत झट। 
नेकी को नेग समझते खुद को नेगी, 
यही झंझट। 
नेकी यष्टी पर, यष्टि चलाते, 
नेकी भूलते चट-पट।

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