Radheshyam Joshi 29 Dec 2025 कविताएँ समाजिक 6048 0 Hindi :: हिंदी
मैं देख रहा हूं हर बार की तरह, इस बार भी 'बार' सजेंगे। अमीरों का जश्न रात भर, गरीब की ठिठुरन पर भारी पड़ेंगे। कैलेंडर की तारीख भी बदल जाएंगी, लोगों की जरूरतें भी बदल जाएंगी। क्या बदलेंगी वो पुरानी लकीरें- तकदीरें? हाथों की रेखाओं में खुदी संघर्ष-जंजीरें? आम आदमी भी उत्साहित है, नये साल के स्वागत को आतुर है। नया साल नई उम्मीद, फिर सूझी है एक किरण। टूटते बिखरते सपनों को, समेटकर संजोउंगा मैं। कुछ अच्छा भी था, छूट गया, कुछ पाने का सपना टूट गया। आशा-निराशा की आंख मिचौली, समय काट देती है... और साल भी। जानता हूँ मैं राहें अब भी आसान नहीं, मगर, रुक जाना तो मेरी पहचान नहीं। हर ठोकर को सीढ़ी बनाता जाऊंगा मैं, गिर गिरकर फिर से, संभल जाऊंगा मैं। बस यही दुआ है इस नए सवेरे से, जश्न की रोशनी सबके आंगन पहुँचे। खुशियाँ सिर्फ महलों तक ही थमी न रहे, हर इंसान सुखी हो जीवन में गमी न रहे। - राधेश्याम जोशी कोहिणा