Santosh kumar koli ' अकेला' 06 Sep 2024 कविताएँ समाजिक कलयुग के रंग 34048 0 Hindi :: हिंदी
लगेगी कलयुग की फटकार, मचेगा जग में हाहाकार गाय, खूंटा तुड़वाकर भागेगी, निज पति संग रास नहीं, नारी पर पुरुष से नैन लड़ाएगी। औरों की बात नहीं, कन्या निज पिता से नहीं बच पाएगी। ब्याह कर बेटा लाएगा, बहू ससुर के मन भाएगी। होगी बेचैनी की भरमार। मचेगा जग में हाहाकार। निज पत्नी दाना तक तरसे, वेश्या घर नाच नचाएगा। कथा में श्रोता सोए, वक्ता मूंड़ पचाएगा। जहां, कहीं हो स्वांग, तमाशा, पलक नहीं झपकाएगा। मुट्ठी अन्न साधु को नहीं, मूंड फोड़कर जाएगा। मिटेगी लेन- देन उधार। मचेगा जग में हाहाकार। लगेगी कलयुग की फटकार, मचेगा जग में हाहाकार। खूब फले- फूलेगा, कुऋतु का बोया। जग में नाम करेगा, कुबीज का जाया। शिल डूब, लोढ़ा तैर आया। पापी पार उतरेगा, धर्मी डुबकी खाया। ईमानदारी की इज्ज़त, होगी तार तार। मचेगा जग में हाहाकार। कोयल की कोई नहीं सुनें, दादुर वक्ता होएगा। गधा सोए अजा की सेज, सूर्य पश्चिम से उग आएगा। सिंह सोए सियार की साया, गीदड़ राज चलाएगा। घोड़े को भाएगा मांस, सिंह घास खाएगा। होगी पानी की मारामार, मचेगा जग में हाहाकार। लगेगी कलयुग की फटकार, मचेगा जग में हाहाकार।