Danendra 30 Mar 2023 कविताएँ समाजिक झन भुलाहा संगी, झन भुलाहा ना 51366 0 Hindi :: हिंदी
छत्तीसगढ़ के माटी,चंदन के लकड़ी
आऊ छत्तीसगढ़ी भाखा,बोली
ल झन भुलाहा
झन भूलाहा संगी ,झन भुलाहा ना
दाई ददा आउ पुरखा के संगी
हाथ जोड़ आउ राम राम
कहैया हमर संस्कृति ल
झन भुलैया ,संगी झन भुलैया
चारो डहर मैं बैठे हे देवता
पूजा पाठ में करत ह न्योता
पीला चाउर दुबी आउ अगरबत्ती
के चड़हैया, ल झन भूलहा संगी,
झन भूलहा ना
सरहद में खड़े हे खड़े फौजी भाईया
दाई ददा, भाई भईया, आउ बहीनी
के सुरता करत, बंदूक ल ताने सरहद म
जवान ल झन भुलैया संगी, झन भूलाहा
दू पैसा कमाए बर, शहर में आगे
आऊ गाव गली के खेल्ल्या सुरता म
आखी से आशु ह बोहात ,के मजा ल
झन भूलाहा सगी , झन भूलाहा
लाईका रहेन , त बाटी खेले, सायकल
के चक्का ल हाथ में ढुलॉये
झरझर, भरभर पानी गिरत म नाचे के
मजा ल झन भूलहा, सगी झन भूलाहा
तरिया नरवा, डबरी म मछरी धरे
आऊ नहाए के मज़ा ल झन भूलाहा
झन भूलाहा, संगी झन भूलाहा ना
कतको पीड़ा होए, परेशानी होय ,
दाई दादा के पैर छुए के मजा
आऊ शुक्रिया लेहे बर अपन
परिवार ला झन भूलहा संगी ,झन
भूलाहा, संगी झन भूलाहा ना
Danendra
Chhattisgarh