प्रवीण कुमार 09 Oct 2025 कविताएँ समाजिक 8934 0 Hindi :: हिंदी
ये कैसी मोहब्बत रही। हम ज़माने के काम करें शायद! बे-हद, सवालों की किताब बने। ये कैसी मोहब्बत रही। सामने परिवार बे-परवाह ज़िन्दगी साथ । ये कैसी मोहब्बत रही। तालिम सच में ज़िन्दगी नहीं। परिवार की मर्यादाएं रही। रोना-हंसना। बचपन में वो ऐसा। सचमुच ज़माने के सामने न आया। मेरी उम्मीदों से ख़ुदा जीत न पाया। ये कैसी मोहब्बत रही। हम ज़माने के काम करें। शायद! बे-हद, सवालों की किताब बने।