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चिड़ी के चोचले

Santosh kumar koli ' अकेला' 29 May 2024 कविताएँ समाजिक चिड़ी के चोचले 26362 0 Hindi :: हिंदी

ज़मीं पर बैठ, 
कभी चलती, कभी फुदकती है। 
कभी खा़मोश, 
कभी खालसा- सा गाती, कहां सुनती है? 
कभी फुर- फुर फुरती में। 
कभी सघन में सघन ढूंढ़ती है। 
कभी बेल की गैल, 
कभी ठूंठ पर ठूंग मारती है। 
कभी डाल पर चलती, 
कभी हवा में लटकती है। 
तिनका- तिनका तई तानापाई, 
तृण -तृण तागती है। 
कभी चुग्गा-चुग्गा चुगती, 
कभी मुंह फेरती है। 
कभी माली की अली, 
कभी आंख मिचौली खेलती है। 
कभी फुरहरी पानी में, 
कभी रेत में नहाती है। 
कभी हमजोली, 
कभी गुत्थम-गुत्था टकराती है। 
चंचल, चुलबली चंट, 
आंगन, कानन में मिल जाती है। 
ये चोचले आजा़दी के, 
सलाखें नहीं सुहाती है।

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