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बदली

Santosh kumar koli ' अकेला' 30 Mar 2023 कविताएँ अन्य बदली (बादल) 48644 0 Hindi :: हिंदी

करे बदली, मैं बरसूं-बरसूं।
किसान करे, मैं तरसूं-तरसूं।
करे धरती, मैं सरसूं-सरसूं।
इंद्रचाप करे, मैं हर्षूं-हर्षूं।
इनसे मत, जलती-भुनती जा।
बदली, अर्ज़ी सुनती जा।
बदली से, बन जा घटा।
मिटा तपस, खोल जटा।
ताल-तलैया, जल से अटा।
धरती से, सौदा पटा।
बूंदों की, चादर बुनती जा।
बदली, अर्ज़ी सुनती जा।
कृषक तुझे, दिन-रात भजे।
बिन बरसे, धरा कैसे सजे?
बरसे, तो मोती उपजे।
बिन बरसे, गिद्धों के मज़े।
धरा का, दर्द चुनती जा।
बदली, अर्ज़ी सुनती जा।
बदली, अर्ज़ी सुनती जा।



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