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बदलाव-मैं लौटा अपने गाँव में जब नहीं मिला मुझे देखने को कोई खेत

पिन्दु कुमार 15 Oct 2023 कविताएँ समाजिक गाँव से शहर में बदलाव 49405 0 Hindi :: हिंदी

मैं लौटा अपने गांव में जब
नहीं मिला मुझे देखने को
कोई भी खेत -खलिहान
भैया - भाभी , चाचा -चाची
सब बन गए थे नया  दुकानदार
बाग-बगीचा , पार्क बन गए
नहर बन गया नाला
 जहां-तहां दुकाने  खुल गई
नहीं रहा बच्चों को खेलने का
छोटा सा भी एक मैदान
जिस जगह मैं खेलता थाअपने बचपन में दोस्तों के साथ
चिक्का या कबड्डी
वहां बन गई बसें तथा गाड़ियों
के ठहरने का स्टैण्ड
जहां थी कच्ची फूंस , मिट्टी
तथा पुआल से बनी
भिन्न -भिन्न तरह की झोपड़ियां
वहां बन गया पक्का ईंटें , सिमेंटेक
तथा छड़ों से बना मकान
जिस पगडंडियों के सहारे मैं
अपने घर को जाता
वो हो गई पुलों में बदलाव
टूटी - फूटी , जहां - तहां ,बड़े- बड़े
गड्डे थे सड़कें पे
वो हो गए चकाचक शानदार
युवा लेखक - पिन्टु कुमार

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