Saurabh Shukla 30 Mar 2023 कविताएँ समाजिक Google/http://kwsvs.blogspot.com/2022/04/blog-post_23.html 39210 0 Hindi :: हिंदी
बैठा बारव्हीं सीढ़ी पर ,
भूला अपने आप को था |
ना था साथ किसी का ,
बस दर्द का साथ था |
मै बैठा था ,
जिस सीढ़ी पर |
वो इस सफर का ,
आखिरी पायदान था |
उस दर्द भरी सीढ़ी पर
अनजान सी चहचहाट आ रही थी |
जाने वो नन्ही चिड़िया क्या बता रही थी |
अचनाक चमत्कार सा हुआ ,
वो बैठी हाथो में जब साक्षात्कार हुआ ||
एक रस्सी कहूँ या डोर जिससे
उसने मुझे जकड सा लिया |
उसके इसी नादान प्रेम ने,
मुझे पकड़ लिया |
उसकी चहचहाट मुझे भाने लगी थी |
लेकिन उसकी पंखो की उड़ान ,
उसे मुझसे दूर ले जाने लगी थी |
न डर था इस बात का ,
की वो दूर जा रही है |
डर था कि कहीं वो किसी के ,
जाल में तो नहीं फसती जा रही है |
मुझे पता था ,इस दुनिया में सब
भोले-भाले लोग ही नहीं बसते |
कुछ कुत्ते तो कुछ बाज तो कही गिद्ध
भी नजर गड़ाए हसते |
जाने क्या हुआ अब उसे घर में पड़ा ,
दाना ना सुहाता था |
क्या हुआ पता नहीं कुछ दिनों से ,
उसे ऊपर उड़ना जाया भाता था |
चाहता तो में भी था ,
वो आसमा को चीरकर ऊपर जाये |
लेकिन कही एक डर भी था ,
कही वो किसी जाल में न फस जाये |