Danendra 30 Jun 2025 कहानियाँ समाजिक 20365 0 Hindi :: हिंदी
बारिश रुकने का नाम नहीं ले रहा था । छत पर टप-टप गिरती बूंदें किसी बीट्स की तरह लग रहा था । संजू खिड़की के पास बैठा था, हाथ में एक मुड़ा-तुड़ा कागज़... बचपन की तरह उसने उसे मोड़ा, मोड़ा... और बना दी एक कागज़ की नाव। वो 25 साल का था — इंजीनियरिंग का छात्र, चार बार कम्पिटीशन एग्ज़ाम में फेल हो चुका था। हर तरफ से ताने मिल रहे थे — “तू कुछ नहीं कर सकता”, “इतनी बार गिरा, अब बस कर दे।” उसने वो कागज़ की नाव पानी में छोड़ी... और मुस्कराया। पास खड़ा उसका दोस्त राकेश हैरान होकर बोला, “अरे भाई, ये सब करने की उम्र नहीं रही अब। नाव बहाने से क्या होगा?” संजू ने गहरी सांस ली और कहा — “राकेश, ज़िंदगी भी तो ऐसी ही है ना। कभी धूप, कभी बारिश... और हम बस एक नाव लेकर बहते रहते हैं। मैं हर बार गिरा, लेकिन हर बार कुछ नया सीखा। जैसे ये नाव, हर बार बनाने में मैं कुछ और बेहतर सीखता हूँ। मैं डूबने से नहीं डरता, मैं रुक जाने से डरता हूँ।” राकेश चुप हो गया। पहली बार उसे अपने दोस्त की हार में छिपा आत्मविश्वास दिखाई दिया। संजू ने कहा, “देख न, ये कागज़ की नाव भी बारिश से लड़ रहा है... तो मैं क्यों न लड़ूँ?” --- सीख: “डिग्रियाँ, नंबर या असफलताएँ तुम्हारा पहचान नहीं होता है। असली पहचान है कि गिरने के बाद भी तुम उठते हो या नहीं। जब तक हिम्मत है, हर कागज़ की नाव भी समंदर पार कर सकता है।”