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माँ

Poonam Mishra 30 Mar 2023 गीत समाजिक मां को याद करते हुए एक कविता नवरात्रि का समय चल रहा है 131170 0 Hindi :: हिंदी

माँ


इस अजनबी दुनिया में 
मुझे अकेला छोड़ कर के
 कहां चल दी माँ

अब जहां भी हो तुम 
मुझे वहां से संभालो ना माँ

 संस्कारों में पली-बढ़ी मैं 
 न जाने कहां खो गए 
संस्कार मेरे  माँ 

उलझन में उलझती जा रही हूं
 रास्तों से भटकती जा रही हूं
 अब तुम जहां हो वहां से 
मुझे पकड़कर निकालो ना
 माँ 

मैं भटक गई हूं रास्ते से 
अपने दुनिया भी भटक रही है
 ऐसा लग रहा है माँ

कि मैं अपने जज्बात
 किस से बयां करूं 

तुम जो मेरे पास नहीं हो 
 मुश्किलों से घिर गई हूं 
हालातों से टूट गई हूं

 एक गुमराह भटकते 
बालक की तरह 
इधर-उधर भटक रही हूं 

मुझे अपने आंचल में छुपा कर
 माँ मेरे सर पर हाथ रखो ना माँ


 स्वरचित 

लेखिका पूनम मिश्रा

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