मारूफ आलम 30 Mar 2023 ग़ज़ल समाजिक #hasrat#maroof#gajal#hindi gajal 73971 0 Hindi :: हिंदी
सुबहों शाम हाथों को हसरत से मलते हो इसी वजह से तुम मेरे बजूद को खलते हो ना चिंगारी निकलती है ना आग जलती है चाहत मे तुम कितनी मुहब्बत से जलते हो चांद सूरज का तो पता है दुनिया को लेकिन अल्लाह ही जाने तुम किधर को ढलते हो मैं उसी कमरे का आईना हूँ जिसमे अक्सर ठहर कर तुम रोज अपने कपड़े बदलते हो तुममे और मुझमे यही एक फर्क है"आलम" मै हलाल पे पलता हूँ तुम हराम पे पलते हो मारूफ आलम