शरद भूषण मोंगरा 25 Apr 2026 ग़ज़ल समाजिक क्यों तरसता तरसता सा आदमी, बड़ा शहर, इस बड़े शहर की क्या कहूं दास्तान 4474 0 Hindi :: हिंदी
"क्यों तरसता तरसता है आदमी", इस बड़े शहर की क्या कहूं दास्तान ना पेट में खाना है ना है सर पे मकान तन पे कपड़े नहीं सामने है दुकान कैसे जर्जर पड़ा मेरा खाली मकान। क्यों तरसता तरसता सा है आदमी कहीं बेबस खड़ा है यही आदमी। कोई कोशिश करे इसकी चलती नहीं शाम भी भूख की इसकी ढलती नहीं। दिल में तूफान उठाने की कोशिश ना कर जो उड़ा है गिरा है वही आदमी। शरद भूषण मोंगरा।