मोती लाल साहु 28 Oct 2025 ग़ज़ल अन्य #गुरु #मोक्ष #आध्यात्मिक #तलाश #सफ़र #ज़िंदगी #भक्ति #मोती 10719 0 Hindi :: हिंदी
नज़र को राह मिली पर सफ़र मिला ही नहीं, बिना उस नूर के दिल का हुनर मिला ही नहीं। पढ़ा किताब-ए-हयात को, हर एक पन्ना खुला, मगर जो भेद था उसमें, वो सर मिला ही नहीं। सजाए लाख महल, दौलत-ओ-शोहरत बटोरी है, जो दिल की प्यास बुझाए, वो ज़र् मिला ही नहीं। भटकते रहे हम चौरासी के भँवर में यूँ, मिला न घाट कहीं, कोई नगर मिला ही नहीं। करेंगे संगतें किसकी, काम, क्रोध, लोभ की ही, जो धर्म-पंथ दिखाए, वो वर मिला ही नहीं। कहाँ मुक्ति की मंज़िल, कहाँ जीवन का सच्चा सुख, बिना 'गुरु' के ये मोती, गहर मिला ही नहीं। -मोती