Anilkumar Rathwa (Sameer) 19 Feb 2026 ग़ज़ल समाजिक #Google#motivational#poetry# 5368 0 Hindi :: हिंदी
ये जो चेहरे पे चमक है, ये सदा रहने की नहीं, वक्त की लहर है साहब, ये रुकने की नहीं। कांच के घर में रहकर पत्थर से मोहब्बत कैसी? ये जो मिट्टी की मूरत है, ये बचने की नहीं। फूल की उम्र ही कितनी है, मगर इतराता है, शाख से टूट के गिर जाए तो खिलने की नहीं। अक्स आईने में जो है, वो महज़ धोखा है, रूह की बात करो, सूरत तो ठहरने की नहीं। नेकियां साथ चलेंगी, यही सच्चा है सरमाया, दौलत-ओ-हुस्न की ये धूप, संभलने की नहीं।