Uma mittal 30 Mar 2023 आलेख धार्मिक श्री वैष्णो देवी की स्थापना कैसे हुई ?, माता वैष्णो देवी की कथा 81494 0 Hindi :: हिंदी
कहानी आज से 700 साल पहले की है आजकल जहां कटरा बसा हुआ है उससे लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर बसा हुआ हंसाली नामक गांव है | चारों ओर वृक्ष और लताओं से भरा हुआ हरा भरा रमणीक स्थल , नीचे कल कल स्वर से बहती हुई जलधारा, धीमी गति से बहती पवन |ऐसे सुखद वातावरण त्रिकूट पर्वत की चोटियों से टकराकर मंत्रों एवं स्तुति की मधुर ध्वनि गूंज रही थी ——– “जय महादेवी ,जय अंबे ,जय भवानी, जय—–“ एकाएक गला भर गया ,आंखें भर आई, उन्नत ललाट पर चंदन के तिलक के साथ पसीने की बूंदें ,उभर आई ——-“मेरी पूजा अर्चना में आखिर क्या त्रुटि है ?हे भगवती ! तुम तो घट घट की जानने वाली हो |मेरी विनती ,मेरी प्रार्थना क्यों स्वीकार नहीं करती ? हे जगत माता !कृपा करो | मेरी भूल, मेरे अवगुण माफ करो नहीं तो ——-नहीं तो सामने आकर स्पष्ट कह दो की मेरे भाग्य में संतान सुख नहीं है | परंतु मेरा वंश कैसे चलेगा ? कैसे—-?” पंडित श्रीधर जैसे अपनी आप से ही बातें करते जा रहे थे , फड़फड़ा रहे थे,शरीर कांपने लगा था , तब पत्तों की खड़ खड़ आहट के साथ आहट सुनाई दी ,फिर “ छन छन छन ———–“ पाजेब की ध्वनि सुनाई दी |पंडित जी ने सिर उठाकर ऊपर देखा तो पत्तों के बीच से आता सूर्य प्रकाश उनके मुख पर पढ़ा ,एक अजीब सी चमक थी| श्रीधर जी कुछ समझ नहीं पाए | आसपास कोई भी तो नहीं था ,अपना भ्रम समझ कर उन्होंने पुष्प अर्पण किए , लोटा संभाला और ऊपर गांव की ओर जल्दी चल दिए , कन्या पूजन की तैयारी भी करनी थी |कन्या पूजन शुरू हुआ | 6 छोटी छोटी बालिका लाइन में होकर बैठी हुई थी |पंडित श्रीधर जी 1 -1 करके सब के चरण बहुत श्रद्धा एवं भक्ति से पानी से धोकर साफ कर कर रहे थे कि अचानक फिर से वहीं आवाज उनके कानों में गूंजी —–छन— छन —छन —- श्रीधर जी ने पैर धोते हुए नजर उठाई तो एक अनुपम सौंदर्य एवं आभा से युक्त बालिका को सामने खड़े पाया |पंडित जी आश्चर्य में डूब गए | ऐसा अलौकिक तेज उस कन्या के मुख मंडल पर बिराज रहा था जैसे सैकड़ों सूर्य एक साथ आकाश में उदय हो गए हो |ऐसा भोलापन ! मानो हजारों कमल पुष्प एकदम खिल गए हो !! यह कन्या तो पहले कभी उन्होंने देखी ना थी, ना ही उनके गांव की प्रतीत हो रही थी |लाल लाल कपड़े ,पैरों में छन छन करती पाजेब ! कन्या ने अपना पैर आगे बढ़ा दिया | श्रीधर जी चरण धोने लगे , सातों कन्याओं की चरण वंदना करके उन्होंने जलपान परोसा और भोजन के बाद दक्षिणा दी | अन्य कन्याएं तो दक्षिणा ले कर चली गई पर वह दिव्य रूप वाली कन्या ही बैठी रही | श्रीधर जी उससे कुछ प्रश्न करने वाले थे कि कन्या रूपी महाशक्ति स्वयं ही बोली – “मैं तुम्हारे पास एक आवश्यक काम लेकर आई हूं |” छोटी सी कन्या के मुंह से ऐसी विचित्र बात सुनकर भक्त जी और भी हैरान हो गए | कन्या बोली “अपने गांव में और आसपास यह संदेश दे आओ कि कल दोपहर को आपके यहां भंडारा होगा|” इससे पहले कि पंडित जी कोई प्रश्न पूछे कन्या ना जाने किधर गायब हो चुकी थी |श्रीधर जी विचारों में डूब गए | आखिर यह कन्या कौन थी? हो ना हो, यह अवश्य ही कोई दिव्य बालिका थी ,परंतु भंडारे वाली समस्या से श्रीधर जी परेशान हो गए |सोचने लगे कि निमंत्रण तो मैं दे आऊंगा परंतु भंडारे का प्रबंध कौन करेगा ?मुझ में तो इतनी समर्थ नहीं ,भंडारा कर सकूं फिर क्या करूं ? परंतु—- यदि कन्या कोई दिव्य शक्ति है ,तो अवश्य यह मेरी परीक्षा की घड़ी है| श्रीधर ने उस दिव्य कन्या की बात मान ली और आस – पास के गाँवों में भंडारे का संदेश पहुँचा दिया। वहाँ से लौटकर आते समय गुरु गोरखनाथ व उनके शिष्य बाबा भैरवनाथ जी के साथ उनके दूसरे शिष्यों को भी भोजन का निमंत्रण दिया। भोजन का निमंत्रण पाकर सभी गांववासी अचंभित थे कि वह कौन सी कन्या है जो इतने सारे लोगों को भोजन करवाना चाहती है? श्रीधर सोच रहे थे इतने कम सामान के साथ भंडारा कैसे होगा। भंडारे के एक दिन पहले श्रीधर एक पल के लिए भी सो नहीं पा रहे थे यह सोचकर वह मेहमानों को भोजन कैसे करा सकेंगे,इतनी कम सामग्री और इतनी कम जगह.. दोनों ही समस्या थी। वह सुबह तक समस्याओं से घिरे हुए थे और बस उसे अब देवी मां से ही आस थी। इसके बाद श्रीधर के घर में अनेक गांववासी आकर भोजन के लिए एकत्रित हुए। वह अपनी झोपड़ी के बाहर पूजा के लिए बैठ गए,दोपहर तक मेहमान आना शुरू हो गए थे श्रीधर को पूजा करते देख वे जहां जगह दिखी वहां बैठ गए। सभी लोग श्रीधर की छोटी से कुटिया में आसानी से बैठ गए और अभी भी काफी जगह बाकी थी।तब कन्या रुपी माँ वैष्णो देवी ने एक विचित्र पात्र से सभी को भोजन परोसना शुरू किया। भोजन परोसते हुए जब वह कन्या भैरवनाथ के पास गई। भैरवनाथ ने कन्या से वैष्णव खाने की जगह मांस भक्षण और मदिरापान मांगा। लेकिन यह तो संभव नहीं था, फलस्वरूप कन्या रूपी देवी ने उसे समझाया कि यह ब्राह्मण के यहां का भोजन है, इसमें मांसाहार नहीं किया जाता।तब भैरवनाथ ने कहा कि” मैं तो खीर – पूड़ी की जगह मांस भक्षण और मदिरापान करुंगा।” भैरवनाथ जान – बुझकर अपनी बात पर अड़ा रहा। भैरवनाथ ने उस कन्या को पकडऩा चाहा| कन्या वायु रूप में बदलकर त्रिकूट पर्वत की ओर उड़ चली। भैरवनाथ भी उनके पीछे गया। इस बीच पंडित श्रीधर अधीर हो गए। भंडारे के बाद , श्रीधर उस छोटी कन्या वैष्णवी के बारे में जानने के लिए उत्सुक था , पर वैष्णवी गायब हो गयी थी , और उसके बाद किसी को नहीं दिखी। श्रीधर को उस छोटी लड़की का सपना आया जिसने उससे कहा की वह माँ वैष्णो देवी थी । माता रानी के रूप में आई लड़की ने उसे सनसनी गुफा के बारे बताया और चार बेटों के वरदान के साथ उसे आशीर्वाद दिया। श्रीधर खुश हो गया और माँ की गुफा की तलाश में निकल गया , मान्यता के अनुसार उस वक़्त भी हनुमान जी माता की रक्षा के लिए उनके साथ ही थे। हनुमानजी को प्यास लगने पर माता ने उनके आग्रह पर धनुष से पहाड़ पर बाण चलाकर एक जलधारा निकाली और उस जल में अपने केश धोए। आज यह पवित्र जलधारा बाणगंगा के नाम से जानी जाती है, जिसके पवित्र जल का पान करने या इससे स्नान करने से श्रद्धालुओं की सारी थकावट और तकलीफें दूर हो जाती हैं। इस दौरान माता ने एक गुफा में प्रवेश कर नौ माह तक तपस्या की। भैरवनाथ भी उनके पीछे वहां तक आ गया। तब एक साधु ने भैरवनाथ से कहा कि तू जिसे एक कन्या समझ रहा है, वह आदिशक्ति जगदम्बा है। इसलिए उस महाशक्ति का पीछा छोड़ दे। भैरवनाथ ने साधु की बात नहीं मानी। तब माता गुफा की दूसरी ओर से मार्ग बनाकर बाहर निकल गईं |यह गुफा आज भी अर्धकुमारी या आदिकुमारी या गर्भजून के नाम से प्रसिद्ध है। अर्धक्वाँरी के पहले माता की चरण पादुका भी है। यह वह स्थान है, जहाँ माता ने भागते – भागते मुड़कर भैरवनाथ को देखा था। गुफा से बाहर निकल कर कन्या ने देवी का रूप धारण किया। माता ने भैरवनाथ को चेताया और वापस जाने को कहा। फिर भी वह नहीं माना। माता गुफा के भीतर चली गई। तब माता की रक्षा के लिए हनुमानजी ने गुफा के बाहर भैरव से युद्ध किया। भैरव ने फिर भी हार नहीं मानी , तब माता वैष्णवी ने महाकाली का रूप लेकर भैरवनाथ का संहार कर दिया। भैरवनाथ का सिर कटकर भवन से 8 किमी दूर त्रिकूट पर्वत की भैरव घाटी में गिरा। उस स्थान को भैरोनाथ के मंदिर के नाम से जाना जाता है। जिस स्थान पर माँ वैष्णो देवी ने भैरवनाथ का वध किया, वह स्थान पवित्र गुफा’ अथवा ‘भवन के नाम से प्रसिद्ध है। इसी स्थान पर माँ काली (दाएँ), माँ सरस्वती (मध्य) और माँ लक्ष्मी (बाएँ) पिंडी के रूप में गुफा में विराजित हैं। इन तीनों के सम्मिलत रूप को ही माँ वैष्णो देवी का रूप कहा जाता है। इन तीन भव्य पिण्डियों के साथ कुछ श्रद्धालु भक्तों एव जम्मू कश्मीर के भूतपूर्व नरेशों द्वारा स्थापित मूर्तियाँ एवं यन्त्र इत्यादी है। कहा जाता है कि अपने वध के बाद भैरवनाथ को अपनी भूल का पश्चाताप हुआ और उसने माँ से क्षमादान माँगी। माता वैष्णो देवी जानती थीं कि उन पर हमला करने के पीछे भैरव की प्रमुख मंशा मोक्ष प्राप्त करने की थी, उन्होंने न केवल भैरव को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति प्रदान की, बल्कि उसे वरदान देते हुए कहा कि “मेरे दर्शन तब तक पूरे नहीं माने जाएँगे, जब तक कोई भक्त मेरे बाद तुम्हारे दर्शन नहीं करेगा।” उसी मान्यता के अनुसार आज भी भक्त माता वैष्णो देवी के दर्शन करने के बाद 8 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़कर भैरवनाथ के दर्शन करने को जाते हैं। इस बीच पंडित श्रीधर अधीर हो गए। वे त्रिकुटा पर्वत की ओर उसी रास्ते आगे बढ़े, जो उन्होंने सपने में देखा था, अंततः वे गुफ़ा के द्वार पर पहुंचे, उन्होंने कई विधियों से ‘तीन भव्य पिण्डियों’ की पूजा को अपनी दिनचर्या बना ली, देवी उनकी पूजा से प्रसन्न हुईं, वे उनके सामने प्रकट हुईं और उन्हें आशीर्वाद दिया। तब से, श्रीधर और उनके वंशज देवी मां वैष्णो देवी की पूजा करते आ रहे हैं। माता ने आशीर्वाद देकर कहा कि “तुम्हारा वंश युगो युगो तक मेरी पूजा करता रहेगा और सुख शांति धन्य ,धन्य वैभव सभी कुछ प्राप्त करेगा ,माता ने श्रीधर को दर्शन देकर उन्हें चार पुत्रों का वरदान दिया |अब तक पंडित श्रीधर जी के वंशज मां की पूजा करते आ रहे हैं ,इसके बाद श्रीधर जी ने गुफा का प्रचार किया |मां वैष्णो देवी की प्रसिद्ध चारों ओर बढ़ने लगी |भक्तों की संख्या बढ़ने लगी |भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती रही | प्रचार बढ़ता रहा | हजारों लाखों यात्री प्रति वर्ष वैष्णो देवी के दर्शन के लिए आने लगे और तीर्थ वैष्णो देवी के नाम से प्रसिद्ध हो गया || इसमें कोई संदेह नहीं है कि मां वैष्णो देवी की इच्छा या उनके बुलावे के बिना कोई भी माता के दर्शन नहीं पा सकता | नोट :- श्री वैष्णो देवी धाम में कोई भी माता का अंग नहीं गिरा है | जहां माता के अंग गिरे हैं वह शक्तिपीठ कहे जाते हैं परंतु वैष्णो देवी एक ऐसा धाम है जहां पर माता वैष्णो देवी तीन भव्य पिण्डियों के रूप में साक्षात विराजमान है | जय माता दी || उमा मित्तल राजपुरा टाउन (पंजाब