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संदीप कुमार सिंह
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संदीप कुमार सिंह
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संदीप कुमार सिंह
@ sandeep-kumar-singh
, Bihar
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me.
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रूप इतना प्यारा कि पहली ही नज़र में दिल उसमें डूब गया है
(मुक्तक छंद) रूप इतना प्यारा की पहली ही नज़र में दिल उस में डूब गया है, गुलाब की फूल सी सुरभित चेहरा आकर्षणीय शानदार लगती है, गोरे मुखड�
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रिश्ते को सम्हाले रखना ही बहुत बड़ी बात है
रिश्ता तो रिश्ता होता है फिर खुशी होते, जिससे अपना दिल लगा वही अपने होते, फिर पराए भी खासम खास हो जाते हैं_ जिंदगी में फिर फूलों की खुशब
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आंखों में चाहतों की है बारात
आह! आकर्षक कितनी नाज़ुक फूल सी है चेहरा, बातों में मानो शहद भरी है प्यार, शोखियाँ भी सारे गज़ब लाज़वाब_ नज़र हटने का इरादा नहीं करता।
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पहले तो हम दोनों में- बहुत फासला रहा करता था
(मुक्तक छंद) पहले तो हम दोनों में बहुत फासला रहा करता था, और मन में प्यार की गुलाब फूल खिला करता था, धीरे_धीरे प्यार ली अंगराई एक_दूजे से
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समय समय का फेर था-गए वनवास राम
(दोहा छंद) समय समय का फेर था, गए वनवास राम। रावण का वध थे किए,अमर हुआ तब नाम।। समय समय का फेर था, सत्य गया था हार। भरी सभा में द्रौपदी, करी
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खुद से प्यार करो मतलब अच्छे कर्म करो
खुद से प्यार करो, खुद पर ऐतबार करो, जिन्दगी को बड़ी ही सादगी से जीते चलें। चार दिन की इस जिन्दगी में रोना नहीं, खुद भी हसूं और दुनिया को
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जिसकी जैसी भावना-वैसा ही वह कर्म कर पाता
(कुंडलिया छंद) जिसकी जैसी भावना, प्रभु का भी तस दृष्टि। वैसा ही वह कर्म कर,पाता आसी वृष्टि।। पाता आसी वृष्टि,तेज तब उसका बढ़ता। देता �
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उत्साह में हम रहें-और उत्साह हम में रहे
उत्साह में हम रहें और उत्साह हम में रहे, तब जीवन के हर जंग में जीतना तय है। संघर्षों की इस धरा पर नित संघर्ष है, बाधाओं का भी आना निशित ह
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मिली अहं को मात जब-हुआ मजबूत धर्म
(दोहा छंद) मिली अहं को मात जब, दानव बने विनीत। पछताए मन में बड़ा, बनना चाहा मीत।। मिली अहं को मात जब, हुआ मजबूत धर्म। भक्ति भाव सबमें बढ�
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गुलशन होगा तब जहां-बनिए सबके अर्क
(कुंडलिया छंद) जीवन में हर कार्य पर,करिए अवश्य तर्क। गुलशन होगा तब जहां,बनिए सबके अर्क।। बनिए सबके अर्क,राह प्रशस्त कर सबका। बने रहनु�
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