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संकट मोचन हनुमान मंदिर वाराणसी

Uma mittal 30 Mar 2023 आलेख धार्मिक श्री हनुमान भगवान जी , श्री हनुमान भगवान जी का मंदिर 84177 0 Hindi :: हिंदी

उत्तर प्रदेश के वाराणसी में यह श्री हनुमान भगवान जी का मंदिर है |इस मंदिर का नाम संकट मोचन हनुमान मंदिर है | संकटमोचन का अर्थ है:- दुखों को हर लेने वाले | इस मंदिर के परिसर में लगभग 5 एकड़ में जंगल फैला हुआ है | यह जंगल लगभग 600 साल पुराना है | इसी जगह तुलसीदास जी को पहली बार श्री हनुमान जी के दर्शन हुए थे | जब तुलसीदास जी को भगवान हनुमान जी के दर्शन हुए तो तुलसीदास ने भगवान श्री हनुमान जी से श्री राम भगवान के दर्शन करवाने के लिए उनसे काफी विनती की |तब हनुमान भगवान ने तुलसीदास जी से कहा “तुम ,चित्रकूट चले जाओ” |वही तुम्हें श्री राम- लक्ष्मण जी के दर्शन होंगे “| तुलसीदास जी गंगा के किनारे चंदन लेकर बैठ गए | वहां हर आने जाने वाले को चंदन लगा रहे थे कि वही श्री राम जी लक्ष्मण जी के साथ आए |तब तुलसीदास जी भगवान राम को पहचान नहीं पाए |तब श्री हनुमान भगवान जी तोते का वेश बनाकर यह दोहा कहते हैं :-
चित्रकूट के घाट पर
भई संतन की भीर |
तुलसीदास चंदन घिसे
तिलक देत रघुवीर ||
तब तुलसीदास जी श्री राम भगवान को पहचान गए |तब तुलसीदास जी को श्री राम भगवान के दर्शन हुए और उनको निहारते ही रह गए | अतः वाराणसी में श्री तुलसीदास जी ने श्री हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित की थी | कुछ लोगों का मानना है कि यहां पर हनुमान जी स्वयं प्रकट हुए थे | हनुमान जी की मूर्ति के ठीक सामने श्री राम जी की प्रतिमा है | ऐसा लगता है जैसे राम जी के हनुमान जी हर पल दर्शन कर रहे हो |इस मंदिर में दूर-दूर से भक्त आते हैं और झोली भर कर जाते हैं |कभी कोई निराश नहीं होता |यह मंदिर बहुत ही भव्य और सुंदर है | इस मंदिर की जितनी भी प्रशंसा की जाए, उतनी कम है| इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि पूरी रामायण पढ़ने के बाद कहीं पर भी ऐसा नहीं लगता कि श्री हनुमान भगवान जी ने गलती से भी कोई गलती की हो |हनुमान जी अपने बुद्धि और विवेक से हर मुश्किल से मुश्किल कार्य को आसानी से कर देते हैं |तभी तो हनुमान जी के लिए कहा गया है :-
विद्यावान गुनी अति चतुर ,
राम काज करिबे को आतुर ||
अर्थात आप विद्या से परिपूर्ण है | गुणों की खान है| अत्यंत बुद्धिमान है |श्री राम जी के कार्य करने के लिए तत्पर रहते हैं और श्री राम जी को भी हनुमान जी इतने प्रिय हैं ,तभी तो श्री तुलसीदास जी ने अपनी हनुमान चालीसा में लिखा है:-
रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई ,
तुम मम प्रिय भरत सम भाई |
सहस बदन तुम्हारो जस गावे ,
अस कहि श्रीपति कंठ लगावे ||
अर्थात श्री राम भगवान ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा कि “तुम, मेरे भरत जैसे प्यारे भाई हो | तुम्हारा यश हजारों मुख से सराहनीय है,यह कहकर भगवान राम ने श्री हनुमान जी को अपने गले से लगा लिया | सचमुच श्री हनुमान जी की जितनी प्रशंसा की जाए ,उतनी ही कम है |
जय श्री राम ||
उमा मित्तल
राजपुरा टाउन (पंजाब)

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